सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य(Socio-Cultural Aspects)
परिवार संरचना- परिवार समाज की प्राथमिक इकाई रही है और यहाँ सयुक्त परिवार सदैव ही वांछित रहा I सयुंक्त परिवार में सबसे बड़े बुजुर्ग को ठगड़ा कहते हैं और परिवार के सभी निर्णय आवश्यक परामर्श उपरान्त करता हैं और अन्य सदस्य उसके निर्णय को मानते हैं I धन की आकस्मिक आवश्यकता पड़ने पर भी ठगड़ा ही ऋण उठता हैं और वापिस करने के लिए भी वही उत्तरदायी होता हैं I इतना ही नहीं गाँव की पंचायतों में और खुम्बलियों में भी वही परिवार का प्रतिनिधित्व करता हैI पुरुष का दायित्व आय के संसाधनों को जुटाना हैं और परिवार का भरण पोषण करना हैI इस ग्रामीण समाज की एक और विशेषता है नातेदारी I यंहा चाचा, ताया, ताई, चाची आदि सम्बोधन का लोप हैं बल्कि बाबा/बोबा, माएं, आदि सम्बोधन तथा ममरे नाना-नानी और पैतृक नाना-नानी दोनों के लिए एक जैसा ही प्रयोग किया जाता है I बड़े भाईयों को दादा और बहनों को दादी कहते हैं I
| हिन्दी में नातेदारी शब्द | हाटियों में प्रयुक्त नातेदारी शब्द |
|---|---|
| दादा | नाना |
| दादी | नानी |
| नाना | नाना |
| नानी | नानी |
| पिता | बाबा/बोबा |
| माता | मांए |
| बड़ा भाई | दादा |
| छोटा भाई | भाईया |
| बड़ी बहन | दादे |
| छोटी बहन | भाएटे |
| बुआ | बेबे |
| चाचा | कान्छा बाबा/बुबा |
| ताऊ | जेठा बाबा/बुबा |
| चाची | कांछी माए |
| ताई | जेठे माए |
| ससुर | शौउरा |
| सास | शाशू |
| पति | मालअक |
| पत्नी | बोईर/घरवाले |
| मामा | मौउला/मामा |
| फूफा | मामा |
| ससुराल | शराड़े |
हाटी समाज में बहुपति प्रथा न्यूनाधिक रूप में आज भी विद्यमान हैं लगभग अधिकतर गाँव में जोड़ीदारी के उदाहरण मिल जाते हैं जो की सयुंक्त परिवार व्यवस्था की एक मजबूत कड़ी मानी जाती हैं I यदपि वर्तमान में बहुपति प्रथा का प्रचलन बहुत कम हो रहा हैं I
विरासत प्रणाली: हाटी समाज में विरासत प्रणाली गिरिपार सिरमौर के सभी गाँव में अपनाई जाने वाली प्रणाली के समरूप हैं I सामान्य स्थिति में पैतृक सम्पति में घर के सभी पुरुषों का सयुक्त मालिकाना हक़ माना जाता हैं I बंटवारे की स्थिति में पैतृक सम्पति का विभाजन केवल भाइयों की संख्या के आधार पर होता हैं और बहनों को, चाहे विवाहित हो या अविवाहित, किसी प्रकार का हिस्सा सामान्य स्थिति में नहीं मिलता है I यदि कोई व्यक्ति पुत्रविहीन अपनी सम्पति छोड़ता है तो पुत्रियों को विरासत मिलती हैं लेकिन विवाहित होने पर पुत्री के सबसे नजदीक नातेदार उस सम्पति की देखभाल करते हैं और उस पुत्री के आजीवन रिश्तेदार के रूप में सारी रस्में-रिवाज़ निभाते हैं लेकिन घर-जंवाई का प्रचलन कतई नहीं है और इसे समाज में बहुत ही बुरी दृष्टि से देखा जाता हैं I यदि कोई व्यक्ति सन्तान विहीन मरता हैं तो उसकी सारी सम्पति उसके भाईयों को जाती हैं लेकिन उसका भाई भी जीवित नहीं है तो उसका निकट बंधु उसका हक़दार रहता हैं I सम्पूर्ण वंशज के खत्म होने पर उस परिवार का “उगलणा” कहते हैं और उस स्थिति में उसकी सम्पति कभी-कभार लावारिस रहती हैं तो उसे देवता के मंदिर को भेंट की जाती हैं I
परिवार में सामन्य बंटवारे की आवश्यकता पर जेठोंग, काश्टोंग और कान्छोंग की व्यवस्था रहती हैं जिसमें बड़े बेटे को जैठोंग, मध्य को काश्टोंग और सबसे छोटे बेटे को कान्छोंग एक अतिरिक्त हिस्से के रूप में दिया जाता हैं I बड़े बेटे अक्सर सबसे बड़ा खेत और छोटा बेटा अक्सर पुश्तैनी मकान प्राप्त करते हैं I घर का बड़ा वर्तन, अच्छा पशु, अच्छा वस्त्र आदि पर भी बड़े बेटे का पहला अधिकार समझा जाता हैं I बंटवारे को बेड़े या आल के बुजुर्गों के समक्ष किया जाता हैंIअचल सम्पति में बांटते हुए हिस्सों को पृथक करने के लिए पत्थर की बुर्जी लगाई जाती है जिसे ‘ओड़ा’ या ‘सियाना’ कहते हैं I
वर्तमान समय में कागजों में विभाजन हिन्दू उत्तराधिकार क़ानून, 1955 के अनुरूप होता हैं लेकिन व्यवहारिक रूप से परम्परागत प्रणाली ही कायम हैं क्योंकि आज भी न तो विवाहिता बहन या पुत्री वापिस अपने मायके आकर पिता या भाई की सम्पति में हिस्सा लेती है और न ही विधवा अलग होकर पति की सम्पति का बंटवारा चाहती है बल्कि सयुंक्त परिवार में ही वह स्वयं को ज्यादा महफूज़ और सुरक्षित मानती हैं I
जन्म-विवाह एवं मृत्यु से सम्बन्धित रिवाज एवं संस्कार: ग्रामीण समाज में अपनाए जाने वाले संस्कार व रीति-रिवाज़ सदियों से चली आ रही लोक परम्परा पर आधारित होते हैं जो वहां की भौगोलिक संरचना और जलवायु पर निर्भर करते हैं I गिरिपार सिरमौर में जन्म, विवाह और मृत्यु से जुड़े संस्कार व मान्यताएं बिशुद्ध रूप से मौलिक हैं I गर्भवती महिला को अक्सर शोक स्थल पर जाने से मनाही होती हैं और जिन जगहों पर भूत-प्रेतों का वास माना जाता हैं उन जगहों पर भी गर्भवती महिला को नहीं जाने दिया जाता हैं I चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण के समय भी गर्भवती महिला को घर से बहार नही निकलने दिया जाता हैं I नौवें महीने में गर्भवती महिला अपने मायके जाती हैं और लगभग पूरे एक महीने मायके में आतिथ्य का लाभ लेती हैं साथ ही अपने सभी सगे सम्बन्धियों से जी भर कर मिलना हो जाता है I उसकी माँ हर रोज़ उसके मन पसंद के व्यंजन बनाती और खिलाती है ताकी जच्चे और बच्चे दोनों का स्वास्थ्य अच्छा हो सकें I
एक महीने के आतिथ्य के पीछे का तर्क समझना बहुत सरल है- कठीन प्रसव काल के समय प्रसूता का जीवन दाव पर होता है क्योंकि विगत समय में किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सहायता उपलब्ध नहीं होती थी और केवल गाँव की दाई जिसे सुत्कियारी कहा जाता हैं, ही सबसे बड़ी चिकित्सक होती थी I गर्भवती का प्रसव अपने ससुराल में ही होना अनिवार्य माना जाता है I प्रसूता को किसी भी अस्पताल में नहीं ले जाया जाता था घर के ओबरे में ही प्रसव कराया जाता था I
प्रसव पश्चात प्रसूता को गुड़, और घी का काढ़ा अजवाइन के साथ दिया जाता हैं और पूरे तीन समय जच्चा व बच्चा दोनों को गर्म पानी से नहलाया जाता हैं I जिस कमरे में प्रसूता रहती है उस कमरे में केवल महिलाओं को जाने की अनुमति रहती हैं और तेरह दिन तक सूतक माना जाता हैं I
बच्चे के नामकरण की रस्म कुल पुरोहित के सुझावनुरूप पाँचवें, सातवें या फिर नौवें दिन बच्चे की बुआ द्वारा सूर्योदय के समय पुरोहित द्वारा बताई गयी दिशानुरूप अखरोट के साथ गुड़, चावल और तिल, जिसे “चिन्चावले” कहा जाता हैं, वितरित करके रस्म पूरी की जाती हैं जिसमें एक छन्द भी बोला जाता हैं:
“चांदा मामा सूरजअ छूड़अ ला झाँव.....शिविया के बेटे को अमरु नांव” I
अर्थात चाँद व सूरज की किरणों के साथ अमुक के बेटे का अमुक नाम रखा गया हैं I जिन अखरोट को नामकरण के लिए प्रयोग किया जाता हैं उन्हें बाद में बच्चे की जन्म राशी उस समय के लग्नानुसार कुल पुरोहित तय करता हैं और उस राशी के अक्षरानुसार ही बच्चे का नामकरण किया जाता हैं I
विवाह तीन प्रकार के प्रचलित हैं- जाजड़ा, हार और खिताय I इसमे जाजड़ा को सबसे अधिक प्राथमिकता प्रदान की जाती हैं और 99% विवाह इसी पद्दति से होते हैं I इस प्रकार के विवाह में परिवार के बड़े-बुजुर्गों द्वारा ही रिश्ते तय किये जाते हैं और अधिकतर मामलों में लड़का और लड़की एक दुसरे को केवल विवाह पश्चात ही देखते हैं I इसमें रिश्ता पक्का करने के लिए लडके के पिता लड़की वाले के घर जा कर सगाई की रस्म पूरी करता है जिसमे केवल एक रुपये का सिक्का लड़की के समक्ष रखा जाता है अगर लड़की उस सिक्के को उठा लेती हैं तो रिश्ता पक्का समझा जाता हैं I इस रस्म को साए छोड़ना कहते है I
दोनों पक्षों के कुल पुरोहित आपस में साथ बैठ कर जाजड़े की तिथि निश्चित करते हैं तत्पश्चात दोनों पक्षों से माश खाने की रस्म पूरी की जाती हैं जिसमे पहले लडके पक्ष से गाँव के 10 से 12 मौजिज व्यक्ति जा कर लड़की के घर आथित्य सत्कार का लाभ लेते हैं और बाद में लड़की पक्ष को भी माश खाने बुलाया जाता हैं I सबसे बड़े बेटे का जाजड़ा बड़ी धूम धाम से किया जाता है जसे पीढ़ी में एक बार ही दिया जाता हैं और इसमें पूरी गाँव में चूल्हा निओग दी जाती हैं और दो दिन तक गाँव के किसी घर में चुल्हा नही जलता हैं I इसमें 15 से 20 टीन घी, 10 से 15 बकरे, पीने वाले को भर पेट सूर (शराब) और राशन की व्यवस्था की जाती हैं I
इस प्रकार के विवाह में एक और विशेषता यह होती है कि इसमें बारात लड़की की तरफ से आती है जिसमें लड़की के गाँव के सभी घर से एक–एक व्यक्ति बाराती आता हैं जिन्हें जाजडू कहते हैं I जाजडू सुबह अपने गाँव की उस गाँव में पहले विवाहित लड़की या दाएचारे की या फिर भाणजी के घर जाकर पोरोड़ देते हैं जिसमें उबले गेंहू और दो रुपये दिए जाते हैं और उनका सूर, मुड़े और चाय से स्वागत किया जाता हैं I बड़े जाजड़े में एक और विशेषता यह भी होती है कि गाँव के हर घर से एक पुरुष टोलुवा और एक महिला रोटिआरे जाती हैं और विवाह संपन होने तक उस घर में काम करते हैं I बड़ी शादी में हर घर से कारज़ के लिए स्वेच्छा से अनाज, घी और पैसों से भी मदद की जाती हैं और जब देनदार के घर में जाजड़ा होता है तो लेनदार उस वस्तु या पैसे को वापिस लौटता हैं I
हाटी समाज में रोटीआरी की परम्परा
दूसरे प्रकार का विवाह होता हैं हार-जिसमें लड़का अपनी पसंद की लड़की को भगा कर अपने घर लाता है I इसमें लड़की की भी सहमति होत्ती हैं और बाद में दोनों पक्षों के मौजिज (अनुभवी बुजुर्ग) व्यक्ति बैठकर मामले को सुलझाते हैं I दंड स्वरुप लड़के वाले से बकरा और ठीला (एक समय का भोजन) वसूला जाता हैं और इस प्रकार के विवाह भी समाज में स्वीकार्य होता है I
तीसरे प्रकार का विवाह होता है खिताय- जिसमें तलाक शुदा महिला के साथ विवाह किया जाता है और इसमें तलाक के समय ही खीत/रीत के राशी होने वाले पति की तरफ से महिला के मायके द्वारा पहले पति को प्रदान की जाती हैं I एक ऐसा समय था जब जितनी ऊँची खीत/रीत की राशी होत्ती थी उतना ही ऊँचा समाज में महीला का कद माना जाता थाI इस प्रकार के विवाह के समय यदपि ज्यादा खर्च दावत पर नहीं किया जाता था और सादे समारोह में ही विवाह सम्पन्न किया जाता था लेकिन इस प्रकार के विवाह में भी महिला की तरफ से गाँव के कुछ लोग बाराती आते थे I
एक अन्य प्रकार के विवाह का भी प्रचलन था जिसे बाला-विवाह कहते थे I यह एक प्रकार का बाल-विवाह ही था जिसका प्रचलन गिरिपार सिरमौर में प्रचलित था I जो पीढ़ी अब 60 या 70 की उम्र में जी रही हैं उनमें से अधिकतर के विवाह बचपन में ही तय किये गए थे और बहुत छोटी उम्र में ही विवाह सम्पन किये जाते थे I लेकिन विवाहिता अपने ससुराल तभी जाती थी जब उसकी उम्र विवाह के लायक होती थी लेकिन तब तक उसके ससुराल वाले इसके लिए हर त्यौहार, मेलें, उत्सव और पर्व में नए कपड़े तथा त्यौहारों का हिस्सा जरूर भिजवाते थे I
मृत्यु संस्कार के समय मृतक के परिवार के साथ-साथ सम्पूर्ण बेड़ा या आल शोक में रहता है और तीन, पाँच या फिर अधिकतर सात दिनों तक शोक मनाया जाता है कई बार परिस्थितिवश एक ही दिन में भी शोक खोल दिया जाता हैं I मृतक का नदी के किनारे या फिर निर्धारति श्मशान घाट पर जलाया जाता हैं जिसके लिए लकड़ी का प्रबंध गाँव में रहने वाले हरिजन भी करते हैं और इसके एवज में उन्हें पैसा दिया जाता हैं लेकिन यह पैसा मात्र अनुदान हैं न की इसकी कीमत I मोबाइल फोन के प्रचलन से पूर्व हरिजन समुदाय के लोग रिश्तेदारों के घर मृत्यु की सूचना देने जाते थे जिसे ‘काज़ू’ कहते थे और रिश्तेदार उसे भोजन उपरान्त ‘काज़था’ देते थे जिसमें गेंहू का पाथा और घी दिया जाता था I
शोक खुलवाने के समय हर रिश्तेदार अपने साथ एक घी की ‘लोट्की’ और माश का ‘सोला’ ले जाते हैं और गाँव के हर घर से एक आटे और माश का सोला घर की महिला शोकाकुल परिवार के घर ले जाती हैं और हरिजन घर की महिला अपने साथ घास या लकड़ी ले जाती हैं ताकी शोकाकुल परिवार की सहायता हो सकें I शोक के समय हल्दी का सेवन और ‘तुड़का‘ लगाना वर्जित है I खेत में बैल नहीं जोते जाते हैं और अदरक के खेत में नहीं जाते हैं I सूतक या मितक के समय मंदिर और देवालयों में जाना वर्जित हैं I
भाट शोकाकुल परिवार और सम्बंधित बेड़े में खाना नहीं खाते हैं और न ही पानी पीते हैं लेकिन शोक के अंतिम दिन भाट ही सारे खाने का प्रबंध करते हैं I हरिद्वार के लिए या तो तीसरे या फिर पांचवे दिन जाते हैं जिसमें पिंड दान हेतु संस्कार पूरा किया जाता हैं लेकीन कई बार शोक खुलने के पश्चात् भी हरिद्वार में पिंड दान के लिए लोग जाते हैं I
बुजुर्ग पुरुष की मृत्यु के समय उसके नाखून, कान का बाल आदि काट कर रखा जाता है और बुजुर्ग महीला मरने से पूर्व यह निर्धारित करती थी कि मरने के पश्चात् उसे किस प्रकार व कौन सा परिधान पहनाया जाए जिसका प्रबंध वह अपने निजी संदूक में पहले ही करके रखती थी I
गर्भवती महिला की आकस्मिक मृत्यु की स्थिति में उसका दाह संस्कार पेटचाळ (स्थानीय स्तर पर पोस्ट मार्टम) के बाद के बाद ही किया जाता था I महिला की मृत्यु पर उसके मायके वालों की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती हैं लेकिन शोकाकुल घर के सभी रिश्तेदारों भी सम्मिलित होते हैं I छोटे बच्चे की मृत्यु होने पर उसके शव को दफनाया जाता है I
गाँव के हर घर से एक महिला और एक पुरुष की उपस्थिति अनिवार्य होती हैं और तीन महीने तक भी शोक व्यक्त करने वाले परिचित लोग आते रहते हैं I महिला के शव पर उसके मायके का कफ़न सबसे ऊपर रखा जाता हैं और पुरुष के शव पर उसके मामा का कफ़न सबसे ऊपर रखा जाता है I
जब इस क्षेत्र में दुकानों व बाज़ारों तक पहंच नहीं थी तब शव पर डाले जाने वाले कफनों में से केवल तीन या पांच कफ़न ही शव के साथ जलाए जाते थे शेष कफ़न गंगा जल से पवित्रिकरण उपरान्त शोकाकुल परिवार को सौंपे जाते थे जिन्हें बाद में आवश्यकता पड़ने पर प्रयोग किये जाते थे I
हाटी क्षेत्र में सभी प्रकार के संस्कारों में एक और अद्भुत परम्परा रही हैं-सभी समुदायों/जातियों का नि:स्वार्थ भाव से परस्पर सहयोग और इसके लिए स्व-संचालित परम्पराएं नियामक व नियंत्रण की भूमिका चिरकाल से निभाती रही हैं I
त्यौहार, उत्सव एवं मेले: सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र में लगभग हर महा में कोइ न कोई पर्व, मेला या उत्सव मनाया जाता हैं I माघ महा में संक्रान्ति और खोड़ा त्यौहार मनाए जाते हैं I संक्रांति के दिन हर घर से एक व्यक्ति शिरगुल और महासू महाराज के मंदिर जाता हैं और पूरे वर्ष भर के लिए परिवार के हर सदस्य के सुख और सम्पन्नता की कामना करता हैं I कई लोग देवों के बड़े थरणों में संक्रांति के दिन जाते हैं I
फाल्गुन के महीने में “मूल’ के अवसर पर हर घर में सिडकु के लिए ‘अथारा’ लगाना अनिवार्य माना जाता हैं I चैत्र माह में अष्टमी के दिन हर घर में एक व्यक्ति व्रत रखता है और कई घरों में इस अवसर पर देवी को प्रसन्न करने के लिए पाठी (बकरी का मेमना) काटी जाती हैं जिसे “लौऊ छीट” (रक्त चढ़ावा) कहा जाता हैं I
वैसाख महीने में बिशु मेले संक्रांति से प्रारम्भ होते हैं और पूरे माह तक चलते हैं I शिलाई, राजगढ़, संगडाह, आंज भोज, कमरऊ, नौहराधार, हरिपुर धार, लादी भोज, जेल भोज, मस्त भोज आदि ख्सेत्रों में बिशु मेले मुख्य रूप से शिरगुल देवता के मंदिर स्थल पर प्रमुखता से आयोजित किये जाते हैं I इन दोनों बिशु में गाँव से नाचते-बजाते जातर जाती हैं जिसमें पूरे गाँव के सभी पुरुष एक जुलुस के रूप में निर्धारित मेले स्थल पर पहुंचते थे I
नाएणे के बिशु में आरम्भिक समय में चार खुन्दों के बिशु आते थे जिसमें झकान्डो से झोकटियाल, कीणु-पनोग और हल्लाह से जोवाऊ-पौचटा, रास्त से औजौउ और कोटि-बौंच से सिन्गटोऊ की जातर नाचते हुए आती थी I वर्तमान समय मे नाएणे का बिशु तो मनाया जाता हैं लेकिन जातर केवल अब नैनिधार के महिसाणो की ही जाती है I बाहल धार, हरिपुर धार, अँधेरी, संगडाह, राणी बाग़, जामना, सुईनल, गिरनल, हब्बाण, नालोई, गताधर,भवाई, आदि स्थानों पर वैशाख के माह में अलग-अलग तिथियों में बिशु आयोजित होते हैं I
मेलों एवं उत्सव में पहने जाने वाले परम्परागत हाटी गहने
जेठ-अषाढ़ माह में मौण मेलें व मूल मनाया जाता हैं I ‘मीनस का मौण’ नोंएड़े का मौण, पठियार का मौण, शिल्वालो को मौण आदि उल्लेखनीय हैं I इनमें मिनस का मौण सबसे प्रसिद्द था जिसमें चार खुन्दों का आगमन होता था –इसमें झकान्डो से झोकटियाल, शिमला के ध्म्ब्रौली-बिरौली खत से ध्म्ब्राऊ-बिग्राऊ, उत्तराखंड के जौनसार ख़त के बईएला से तिरनोऊ और बनोग ख़त के कन्डो-भटनौल से चंदौऊ अपनी पूरी ख़त, लाव-लशकर और गाजे बाजे सहित नाचते गाते संगम स्थल मिनस आते थे I
ये वीरता और पराक्रम का मेला होता था और इसमें महासू महाराज के ध्वज तले मीनस की विशाल पत्थर शीला पर एक खोश द्वारा टीम्बुर लगाया जाता था जिसके चारों और एक रक्षा पंक्ति बनाई जाती थी I बाकी तीन खोश इसे गिराने के लिए संघर्ष करते थे I इस संघर्ष में कई बार झगड़े होते थे और कई जाने इस संघर्ष में गई लेकिन कोई अदालती मुकद्दमें दर्ज नहीं होते थे और केवल एक रू0 (रू० 1/-मात्र) दण्ड स्वरुप दिया जाता था I इस अवसर पर घर से महिलाऐं तेल्पाकी रोटी साथ खाने के लिए ले जाती थी और महिलाओं और कच्ची उम्र के लोगों को अम्बोटा से नीचे नहीं जाने दिया जाता था ये लोग इसी स्थान पर नाचना गाना करते थे और जब मौण में गए पुरुष वापिस इस स्थल पर पहुंचते थे तो उन्हें तेल्पाकी खिलाई जाती थी I
लोक मतानुसार मौण पर्व की उत्पति शिरगुल महाराज द्वारा चुड्धार से भागे राक्षस का वध करने से जुडी हैं I वही राक्षस चुड़धार से शिरगुल के प्रहार से बचने के लिए जमीन के नीचे से भागा थे और बौंच के समीप गुमराह नामक स्थान पर बहार निकला था इसके पश्चात भंगाल के रास्ते टौंस की तरफ दौड़ा और मीनस के समीप शिरगुल के वार से हताहत होकर विशाल काय शरीर पानी में सड़ने लगा जिससे मीनस और टौंस का पानी दूषित होने लगा और इस राक्षस की काया को हटाने के लिए चार खुन्दों को बुलाया गया था I पानी के शुद्धिकरण हेतु सुखा टिम्बुर डाला गया तब से ये प्रचलन मेले के रूप में मनाया जाता रहा लेकिन झगड़े की सम्भावना को देखते हुई इसे अब पूरी तरह बंद किया गया हैं I
एक और मत भी इस मौण को लेकर प्रचलित है- ऐसा माना जाता हैं कि गब्दौउ भाट ने महासू महाराज का ‘पाथा’ (नई फसल का पहला चढ़ावा) उगा कर मीनस में विश्राम के लिए ठहराव किया और वहां उपस्थित पाँच खूंद जिसमें उपरोक्त चार खोश के अतिरिक्त कीणु-पनौग और हल्लाह के जोआऊ-पौचटा शामिल थे, ने जबरदस्ती उस ‘देवाथा’ (पाथे द्वारा उगाया गया अनाज) के आटे को ग्ब्दौऊ भाट से छीन कर रोटी पकाई और भोजन किया I बाद में महासु महाराज का चार खूंदों को दोष लगा लेकिन इनमे से पांचवा खोश जोवाऊ-पोचटा दोष से बच गया क्योंकि उसने उस आटे से बनी रोटी खाने से मना किया था I इस दोष के निवारण हेतु हर साल इन चारों खशों को महासु की छड़ी मीनस की इस विशाल शिला पर लाकर अपनी गलती का पछतावा करना पड़ता था और बाद में यही रस्म एक पर्व के रूप में विकसित हुईI
जेठ के मूल में हर घर में सिड़कू के लिए अथारा लगाना अनिवार्य माना जाता है चाहे सांकेतिक रूप से ही सही I
शाठी-पाशी के मध्य गिरिपार में बिशु मेले में खेला जाने वाला ठोड़ा
जेठ और अषाढ़ की संक्रांति को चांदपुर धार का मैला लगता हैं जिसमें गताधार, शिरी क्यारी, हल्लाह, नाया पंजोड़, झकांडो, द्राबिल, बनोग ख़त, शिलाई, कांडी सुन्दराडी, आदि क्षेत्रों से लोग बड़ी संख्या में शिरगुल महाराज के मंदिर प्रांगण में औओजित मेले में सम्मिलित होते हैं I सावन माह में या हरियाली का मेला भी पुरे गिरिपार में मनाया जाता हैंI इसमें स्थानीय फलों की भरमार के अतिरिक्त मालिए (पहलवानी) खेली जाती हैं और नाचती हुई जातर ठारी प्रांगण से मेले स्थल तक जाती हैं I संक्रान्ति के दिन घर में ‘पाप’ (हत्या दोष) जिमाया जाता हैं जिसमे नमक और मीठे रहित “चिल्टे” पकाकर घी के साथ पाप/पापड़ा को चढ़ाए जाते हैं और प्रसाद स्वरुप परिवार के सदस्यों को भी वितरित हैं I
असोज माह में अष्टमी का त्यौहार मनाया जाता है और इस अष्टमी के दिन हर घर में इच्छुक लोग व्रत करते हैं कई घरों में इस दिन भी बकरी (पाठी) काटी जाती है और पूजा के समय गुड़ और आटे का प्रसाद बनाया जाता हैं I इस दिन देवी का ‘बंध’ (करार) रखा जाता है और ये पूजा पशुधन को सुरक्षित रखने हेतु की जाती हैं I
कार्तिक व मार्गशीष के माह में गिरिपार के हाटियों का महत्वपूर्ण त्यौहार है मशराली है जिसका आयोजन भारत के अन्य भागों में मनाई जाने वाली दिवाली के एक माह बाद किया जाता है इसलिए इसे ‘बूढी दियाली’ कहा जाता है. इसे मशराली इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस त्यौहार का प्रारम्भ मार्गशीष माह की अमावस्या के दिन माश से बनाने वाली तेल्पाकी से होता है जिसे “ताइये लाणा” कहते हैं I
छोटी अमावस्या के दिन गाँव के बहार बच्चे और नौजवान मिलकर संध्या के समय बलिराज या बद्राज़ जलाते हैं जिसके लिए दस दिन पहले से गाँव के नवयुक लकड़ियाँ, सूखी कंटीली झाड़ियाँ और सूखा घास इकट्ठा करते हैं I ढोल-नगाड़े के साथ नवयुवक और बच्चे उस स्थान पर पंहुंचते हैं और एकत्रित किये हुए सूखे ढेर को आग लगाकर इसके इर्द-गिर्द नाचते हैं I इसका पारंपरिक महत्व इस बात से हैं कि बुराई पर अच्छाई की जीत हों अन्धकार से प्रकाश की और आगमन हो और सम्पूर्ण गाँव की बुराइयाँ इन सूखी लकड़ी की तरह जल जाएँ I
बड़ी अमावस्या के दिन ही गिरिपार में दियाली का आगाज़ होता है I शाम के समय लोग अपने अपने घरों में बीट या डाओ बनाते हैं जो कि या तो बिऊल की सूखी पतली लकड़ी जिसे ‘ष्णयाठा’ कहा जाता है या फिर चीड की सूखी लकड़ी जिसे ‘शैका’ कहते हैं से बनाया जाता है I शाम के भोजन के बाद गाँव के सभी लोग सांझे प्रांगण में एकत्र हो कर ढोल, दुमानो, करनाल और ताली की धुनों के साथ नाचना गाना आरम्भ करते हैं I सुबह तीन-चार बजे केवल पुरुष सांझे प्रांगण में एकत्र हो कर हारूल गायन चलता है I गायन में फूहड़ता (जीरू) के कारण महिलाओं को सम्मिलित नहीं होती हैं लेकिन दूर से महिलायें इसका आनदं ले सकती हैं I
नाचती-गाती टोली महासू मंदिर या किसी देव स्थल के समीप दो भागों में बंट जाती है और एक दूसरे के विरूद्ध आमने-सामने अपना-अपना पराक्रम दिखाने की होड़ में रहती है I दोनों गुट जब बिल्कुल नजदीक आते हैं तो एक दूसरे से शत्रुता का आडम्बर करते हैं ताकि अधिक ज़ोश और आनन्द भरा जा सकें I दोनों गुटों का आपस में मिलना परस्पर भाईचारा, एकता, प्रेम और सौहार्द का प्रतीक हैं I
सुबह की बेला होते ही नृत्यरत समूह वापिस गंतव्य स्थान पर पहुँचता है और इसके बाद अश्लील गायन को बंद कर दिया जाता है I ‘सियाहरण’ गायन उपरान्त महिलायें भी रासा नृत्य में भाग लेती हैं I सभी घरों के बुज़ुर्ग अखरोट के पाँच दाने देवता के प्रांगण में भेंट स्वरुप चढ़ाते हैं जिसे ‘पान्जडी’ कहते हैं और यह रस्म ‘देओ भीऊंराणा’ कहा जाता हैं I प्रांगण में उपस्थित युवक–युवतियाँ भेंट में चढ़ाये गए अखरोट के लिए हास्यरूप में छिना-झपटी करते हैं I
दियाली के अवसर पर बनाया व खिलाया जाने वाला मुड़ा एवं शाकुली
दियाली के दूसरे दिन को ‘भिऊंरी’ कहते हैं जिसका नामकरण एक नारी की अय्त्यंत मार्मिक मायके की बिरह गाथा के ऊपर किया गया है जिसका नाम भिऊंरी था और जिसका मायके में त्यौहार के इस अवसर पर बेसब्री से इंतज़ार होता है जिसे बुलाने के लिए भिऊंरी के सभी परिजन जाते हैं जिन्हें संयोगवंश इस बात की भनक नहीं होती कि उनकी लाडली अब इस दुनियां में नहीं हैं I
इस दिन गाँव की विवाहित लड़कियाँ अपने मायके में भिऊंरी गायन में सम्मिलित होती हैं और इसका गायन बिना वाद्य यंत्रों के ही गाया जाता है क्योंकि यह एक प्रकार का शोक सांत्वना स्वरुप मार्मिक गीत है I गायन के अंत में गाँव की महिलाएं हर घर से मुड़ा, शकोली और अखरोट लाकर भिऊंरी गायन वाली सभी लड़कियों को भेंट करती है जिसे बाद में बाँट दिया जाता है I कभी-कभी कुछ उपस्थित श्रोता गायन वालों को कुछ रूपये भी भेंट करते हैं I
पूरे दिन गाँव के लोग, मायके आयी विवाहित लड़कियाँ तथा मेहमान एक दूसरे के घर जाते हैं और खातिरदारी में उन्हें मुड़ा, शाकोली तथा अखरोट खिलाए जाते है I
सामारोह में महिला द्वारा गले में धारण किया जाने वाला परम्परागत गहना-हान्सुली
भिऊंरी के दिन कुछ और प्रचलित रीति-रिवाजों को उल्लेखित करना भी आवश्यक है I इस दिन लोग अपने घरों में लस्सी नहीं बनाते हैं और पूरी दही को भोजन के साथ खाने में इस्तेमाल किया जाता है I इस दिन घरेलू पशुओं की भी पूजा की जाते है जिसमें गाय तथा बैल प्रमुख होते हैं I उन्हें धूप में बांधकर कर चावल का ‘पीछ’ (चावल पकाने का बाद बचा अतिरिक्त तरल भाग) दिया जाता हैं और सींगों पर घी बनाने के बाद बचे मिश्रण को, जिसे बौलोई कहते हैं, लगाया जाता हैI कृतज्ञता स्वरुप पशुओं को अखरोट चढ़ाये जाते हैं जिसे “भिउराणा” कहा जाता है और उन अखरोट को छोटा बच्चा बाद में उठा लेता हैं I
इस दिन गाँव में हरिजन समुदाय के लोग खशों-कनैतों के घर अखरोट भेंट स्वरुप ले जाते थे जिसे ‘पान्जडी’ कहते हैं I कभी कभी ख़ास रिश्तों के अनुरूप ‘भिऊंरोज़’ भी लाया जाता था जिसमें एक सौ अखरोट भेंट किये जाते थे और बाद में भेंटकर्ता को भी उपहार वापिस दिया जाता था- जैसे बकरी, कपडे, वर्तन या फिर अन्य पशु I इसी दिन बुडीयाचु चोलटू(विशेष पौशाक) पहनकर हुडुक नृत्य करते हुए कई गाँव में जाते थे और उन्हें मुड़ा तथा तेल्पाकी भेंट की जाती थी I
दिवाली के तीसरे दिन को ‘जोंदअए’ कहा जाता है I इस दिन सुबह से ही नृत्य-गायन, रासा नृत्य जिसे ‘तांद’ कहते है, शुरू होता है I दर्शकों के मनोरंजन के लिए गाँव के कलाकार बीच-बीच में सन्देश प्रदत हास्य नाटक जिसे ‘खेल्टू/खैल/स्वांग’ कहा जाता है को प्रदर्शित करते है I इस दिन विशेष पौशाक ‘चौलणा’ के साथ नृत्य किया जाता हैं जिसमें हारूल गायन जैस- पोरोटिया, ठुंदु-कमरौउ, ठिन्दाऊ-सिन्ग्टोऊ, जुआऊ-थोबौउ, संगडाह का ओछ्बू, सैण का सामा, लाणीया-मोईलाणीया, बीणी सेगोग आदि का समावेश रहता है I
पौष के माह में भातियोज का त्यौहार गिरिपार का सबसे महत्वपूर्ण किन्तु खर्चीला त्यौहार है और हर गाँव में यह बड़ी धूमधाम से मनाया जाता हैं I इसकी शुरुआत 27 गते पौष में पड़ने वाले “बोश्तो’ से होत्ती है जिस दिन सुबह 4 बजे उलौउले बनाये जाते हैं और घी के साथ सेवन किया जाता है I दूसरे दिन यानी 28 गते पौष को “भातियोज़” के दिन हर घर में बकरा काटा जाता है I कई सयुंक्त परिवारों में दो या तीन बकरे भी काटे जाते हैं और पूरे माघ माह में दावतों का दौर चलता हैं I
रिश्तेदारों का इस माह एक-दूसरे के घर अवश्य आवागमन होता हैं और विवाहित लड़कियों को मायके के तरफ से गुड़ की भैली और आटा या चावल का पाथा घर के किसी सदस्य द्वारा इसी माह पंहुचाया जाता है I कटे हुए बकरे का सूखा मीट साल भर के लिए भी रखा जाता हैं जिसे पतली व बारीक ‘लोष/लंजारी’ के रूप में घर के छत पर रस्सी से टांग कर अंगीठी के धुंएँ में खूब सुखाया जाता हैं फिर मकान की ठंडी जगह पर या फिर निगाल या बांस से बने डाल या घीला आदि में सुरक्षित रखा जाता हैं I
माघ के माह में “मेलाऊले” (सहभोज) आयोजित करने का भी प्रचलन है जिसमें अपने बेड़े या आल के सभी परिवारों से एक-एक सदस्य एक शाम मेहमान के तौर पर बुलाया जाता हैं और उस दिन या तो एक और बकरा काटा जाता हैं या फिर पहले काटे गए बकरे का ही मीट पकाया जाता हैं और खूब सूर चलती है I हालाँकि ये प्रचलन अब काफी कम हो गया है और अब केवल निकट पड़ोसियों को ही “मेलाऊले” में बुलाया जाता है I
भादों माह में पान्ज्वी का पर्व भी गिरिपार में मनाया जाता है जो महासू से सम्बंधित है I हर गाँव में बने महासू के मंदिर से महासू की छड़ियाँ और पालकियां पंचमी के दिन निकाल कर महासू के ठाणे व माले समीप के कुँए तक गाजे बाजे के साथ ले जा कर देव की छड़ियों पर कुंएं का शुद्ध जल छिड़का जाता हैं जिसे ‘देवता का नाहण’ कहते हैंI पंचमी से पूर्व महासू देवता भी गाँव में भ्रमण के लिए निकलता है और सभी ठाणे देवता की छड़ियों के साथ जाते हैं और शाम को सुनिश्चित किये गए घर में ही रुकते हैं और देव की छड़ियों को घर की छत पर रखा जाता हैं I
असोज़ माह में गुगा नवमी और जन्माष्टमी का पर्व भी गिरिपार क्षेत्र में मनाया जाता है I अधिकतर गाँव में गुगा नवमी हरिजनों में अधिक लोकप्रिय है लेकिन खोश और भाट भी इस गुगा नवमी में शरीक होते हैं और पीर देव की अराधना करते हैं I शिलाई और बिंडला गाँव की गुगाल प्रसिद्द हैं I शिलाई में अष्टमी के दिन गुगा महाराज की विशाल झांकी गाँव से गुगा माड़ी तक जलुसू के रूप में भक्ति नृत्य करते हुए निकलती हैं I
धार्मिक स्थिति- हाटी की शत-प्रतिशत आवादी हिन्दू धर्म को मानती है लेकिन हिन्दुओं के मुख्य देव-देवियाँ से इतर यहाँ विशिष्ट धार्मिक मान्यताएं हैं I लगभग हर गाँव में महासू, शिरगुल, पीर, कोईलू, कुलाणा, ठारी, चार वीर, जोलौऊ, ख्वाजा, भाद्वाश, कुजियाठ, बिजाए, बिजट, नारसिंह आदि देवी-देवताओं की मान्यता हैं I अधिकतर पाशियों में महासू और शाठीयों में शिरगुल कुल देवता के रूप में पूजा जाता हैं I ठारी को शाठी-पाशी दोनों द्वारा थाती शक्ति का प्रतीक हेतु पूजा जाता हैं I एक पीढी में एक बार ठारी देवी की शांत का आयोजन अवश्य किया जाता है ताकि शत्रुओं से रक्षा हो सके I
आज सम्पूर्ण गिरिपार में केवल झोकटियालों के पास जलाहू देवता का आवास एक प्राकृतिक गुफा में अवस्थित हैं जिसका कोई भी साकार रूप मंदिर में नहीं है केवल लाल कपड़े की ध्वजा प्रतीक स्वरूप लगाई जाती है और नमक रहित आटे का ‘रोट’ चढ़ाया जाता है I गिरिपार के कई गाँव में ठारी के भूमिगत मंदिर भी हैं जैसे-झकांडो का भूमिगत तिकोना मंदिर हैं जिसकी स्थापना का शुभ मुहर्त पाबूच महीला ने दिया था जिसके कारण इसे आँगण न कहकर आज भी आन्गटी कहा जाता हैं I
शिरगुल और महासू महाराज को हर छह माह में ‘देव कारी’ (देवता को नियमित रूप से फसल आने पर दिया जाने वाला पहला भाग) या देव पाथा प्रदान किया जाता हैं I गिरिपार के श्रद्धालु अपने कुलदेवता के दर्शन हेतु उत्तराखंड के हनौल मंदिर या चुड्धार के शिरगुल मंदिर में हर वर्ष खैवणी के रूप में जाते हैं साथ ही नई फसल आने पर ‘देवकारी‘ जिसे देवाथा कहते हैं, हर वर्ष प्रदान के जाती हैI
शिरगुल महाराज की पालकी
हर संक्रांति के दिन घर का बड़ा बुजुर्ग गाँव के सभी मंदिरों में परिवार की सुख कामना के लिए जाता है और चढ़ावे में एक सैर आटा, चावल और ताम्बे का सिक्का भेट करता हैं I यदि देवी-देवताओं के दिए ‘बंध’ (करार) का समय पर विवारण न हो तो उसका ‘झूठ’ (दंड) दिया जाता हैं I ठारी को गुड की भैली केवल रविवार को चढ़ाई जाती है और कोई बड़ी कमाना पूर्ण होने पर पाठी (बकरी) को भी चढ़ाया जाता है या फिर बकरे को ‘ढोलकरा’/ घांडुआ (देवता के नाम पर मंदिर परिसर में छोड़ा जाने वाला बकरा) कहकर वहां छोड़ दिया जाता है I
हर संक्रान्ति के दिन ढाकी समुदाय व भगनाण द्वारा हर घर जाकर देव कार्य हेतु निश्चित आटा और घी एकत्र किया जाता है I संक्रांति के दिन घर में पापजिमाया जाता है और घर की विवाहित लड़कियां मायके आकर पाप के चावल उबाल कर सभी को खिलती हैं I हर देव और देवी की पूजा अर्चना करने की अलग पद्दति होती है जिसे “देओ पोजण के काण्डे” कहते हैं I
महासू और शिरगुल मंदिर के पुजारी शुणकुटा समुदाय से है जो की हर संक्रांति के दिन महासू और शिरगुल मन्दिरों में पूजा-अर्चना करते हैं और इस दिन वे उपवास रखते हैं I इस पूजा के एवज़ में गाँव के हर घर से हर फसल के आगमन पर छह माह में “देवाथा” (देव पूजन का मेहनताना) दी जाती हैं I हर फसल का पहला भाग ‘देओ के पाथे” के रूप में रखा जाता है जिसे घर का मुखिया मंदिर में जा कर खुद देवता को चढ़ाता है I हर संक्रांति के दिन हर घर का बुजुर्ग या ठगड़ा अपने कुल देवता के मंदिर अवश्य जाता है और वहां परिवार के हर सदस्यों की सुख समृद्धि की कामना करता है और देवता की आस्था स्वरूप एक रुपया “थामण” (दोष, क्लेश को थामने वाला) चढाता है I
हरिजन समुदाय में पीर और नारसिंग देव विशेष रूप से माना जाता हैं गुगा नवमी के दिन पीर की माड़ी में पूरी रात जागरण होता है लेकिन इससे पूर्व पीर 15 दिन के लिए अपनी माड़ी से बहार निकल कर हर गाँव में यात्रा के लिए जाता है साथ में ‘पीराटे’ (पीर देवता की छडी यात्रा करने वाले) इस देवता के खांडे स्वरुप “कोरड़े’ और छड़ी साथ चलती हैं नवमी से ठीक एक दिन पहले वापिस अपनी माड़ी में पहुंचता है और इच्छुक व्यक्ति नवमी के दिन व्रत रखते हैं और पूरी रात भर दो-दो घंटे के अंतराल में पीर की अर्चना की जाती है जिसे ड़ोंरू के साथ वांचा जाता है जिसे “बार” (भुकडू और पीर की गाथा) कहते हैं I मंदिर में चढ़ावा स्वरूप आटा, चावला और कुछ सिक्के दिए जाते है जिसे “पुजावोण” कहते हैं I मन्नत पूरी होने की स्थिति में मंदिर को बकरा जिसे ‘घान्डूवा’ (देवता के नाम का बकरा) कहते हैं, प्रदान किया जाता है I
पूजा पद्धति- गाँव में महासू महाराज, श्रीगुल महाराज, कुलाणा महाराज, पीर महाराज और ठारी देवी का मंदिर हैं और इनकी अलग-अलग पूजा पद्दति हैं I महासू देवता के लिए दिन के दो वक्त नबद की जाती है और नबद बजाने की विशेष शैली होती है इसलिए केवल ढाकी समुदाय (व्यकार) का जानकार व्यक्ति ही इसे बजाता हैं I
महासू की पूजेल (पूजा) दिन के २ से ३ बजे के बीच होती हैं और इस पूजा के लिए अलग प्रकार की धुन बजाई जाती हैं इस वक्त मंदिर का पुजारी भगवा वस्त्र जो कि महासू की पताका का रंग होता है पहन कर मंदिर के समीप प्राकृतिक जल से भरे कुएं से विशेष लौटे जिसे ‘गाड़ू’ कहते हैं से जल लाकर आग के अंगारे पूजा के पात्र में लेकर इसमें पाजे, घी और चावल के दाने, हवन सामग्री जलते अंगारों पर डालता हैं और मंदिर के गर्भ गृह (पौल्) में जाकर मुख्य मूर्ति की स्तुति करता हैं और उस समय विशेष धुन ढोल, नगाड़े, दुमानो, ताली से ढाकियों द्वारा बजाई जाती हैं और तब तक बजाई जाती हैं जब तक देव पूजन की प्रक्रिया चलती रहती हैं I
देव पूजन की गायन पद्दति को देव कांडी कहा जाता है और जब जागरण होता है तो उस वक्त पूरी देव कांडी गाते हुए लगभग २ घंटे का समय लगता हैं और उस समय तक वाद्य यंत्रो को बजाना जारी रखा जाता हैं I लोग अपनी समस्याओं का निराकरण करने हेतु महासू के उतारीक ‘माली’ के पास जाकर तुरंत उपाय प्राप्त करते हैं और कई बार बात की सत्यता को परखने के लिए बकरे की पीठ पर पानी का हल्का सा हाथ से छिडकाव डाल कर विचार कटा जाता है और अगर उस विचार पर बकरा खुद पानी छिटक दें तो विचार की प्रमाणिकता सिद्ध मानी जाती हैं और अगर बकरा पानी न छिटके तो इस पर देवता के ना या मनाही समझी जाती हैं इस प्रथा को “चूलू पाना और बकरा धुणणा” कहते हैं I
पंचमी के दिन महासू की पालकी और छड़ियाँ स्नान के लिए पुरे गाजे बाजे के साथ मंदिर से कुँए तक जाती है और सैंकड़ों श्रदधालुओं का हुजूम साथ चलता हैं स्नान उपरान्त सांझे प्रांगन में दर्शन हेतु पालकी रखी जाती है लोग अपनी श्रद्धा से पैसो को चढ़ावे के रूप में भेंट देते हैं I गाँव में शोक के समय शोकाकुल परिवार और बेड़ा न तो मंदिर जाते है और न ही पूजा या उपासना में सम्मिलित होते हैं बल्कि गाँव के माली, ठाणी, भण्डारी, पुजारी शोकाकुल परिवार और बड़े में रोटी नहीं खाते हैं I
शिरगुल महाराज की पूजा पद्दति थोड़ी सरल हैं क्योकि इसे ‘धर्मी’ (दयालु) देव समझा जाता है I सामान्य दिनों की पूजा बिना वद्य यंत्रों के की जाती हैं I शिरगुल की पूजा पुजारी महीने की संक्रान्ति के दिन ही करते हैं और पूजा के लिए हर घर से घी एकत्र किया जाता हैं जिसे ‘दिअण’ कहते हैं I जागरण के समय शिरगुल देव पूजा की गायन शैली को देव ‘कांडी’ कहते है जिसमें पूरी गाथा गायन के लिए ३ घंटे लगते हैं I कुलिष्ट के दर्शन हेतु गाँव के हर घर से एक व्यक्ति हर साल या तीसरे साल शिरगुल महाराज के सबसे बड़े तीर्थ स्थल चुड़धार अवश्य जाते हैं I
कुलाणा देवता के लिए घर की महिला द्वारा घी की पहली धार चढ़ाने की परम्परा हैं जब गाय नए दूध में आती है I इसलिए इसे पशुओं के देवता भी माना जाता हैं I गुगाल के समय पीर की स्तुति में लयवद्ध ‘बार’ वांचा जाता है जिसमे केवल डमरू और शंख बजाया जाता I पीर की पूजा पद्धति में एक मुख्य शस्त्र शामिल होता है जिसे ‘कोरडा’ कहते और जब किसी में ‘उतार’ (हवा) आता है तो उस समय जलती आग में तपाये गए उन कोराडो को पीठ में मारा जाता हैं I
जब बार वाचा जाता है तो उस समय कई ऐसे लोगों को को भी “खैल” (हवा) आती है जिस पर या तो कोई बुरा साया हों या फिर किसी के बुरी नज़र लगी हो या फिर किसी दुष्ट आत्मा के प्रभाव में आया हों I पीर के माली या उतारीक उन सभी बुरे प्रभाव से इन्हें बचाता हैं I एक और बात पीर की पूजा में अनोखी है- पीर सभी बात की अनुमति अपने अर्ध्य देव शिरगुल महाराज से मांगता है और गुगाल के समय शिरगुल भी पीर की माड़ी में उपस्थित रहता है और उसकी भी पूजा अर्चना की जाती हैं I ‘बार’ वांचने पर शिरगुल महाराज में भी ‘खैल’ आती है I
पीर को अर्पण हेतु आटे के ‘रोट’ बनाए जाते हैं I कुछ लोग सुबह के समय अपने बच्चों को माडी में ले जाते हैं और “छाटा’ लगाते हैं ताकी बुरी नज़र या बुरे दृष्ट से बचाव हो सकें I पीर को साँपों और जहरीले कीड़ो से बचाव के लिए भी लोक प्रिय माना जाता है I पीर की ध्वजा हेतु लाल कपड़ा लगाया जाता हैं I
‘जोलौऊ’ (जल) देवता के लिए बिना नमक के रोट बनाए जाते हैं इसकी पूजा अर्चना की कोई पद्दति नहीं है और न ही कोई माली, ठाणी, भंडारी है और न ही जागरण आयोजित किया जाता है केवल ध्वजा स्वरुप लाल कपड़ा अर्पित किय जाता हैं I मनोकामना पूर्ण होने पर कुछ लोग ‘खाडू’ (मेढा) की बली भी देते हैंI
सिंगटौंऊ ख़त बौंच में काष्ठ-कुणी शैली में बना नौपूरा ठारी मंदिर
ठारी देवी की भी हर दिन पूजा अर्चना करने की कोइ निर्धारित पद्दति नहीं है और न ही स्तुति हेतु गायन शैली है केवल ‘अर्ज” लगाकर माली में ‘खैल’ आती है और लोग अपनी समस्या का निवारण पूछते हैं I मन्नत पूरी होने पर लोग गुड़ की भैली चढाते हैं और अगर मन्नत बड़ी हो तो लोग ‘पाठी’ भी चढाते हैं I ठारी की पूजा अर्चना के लिए विशाल यज्ञ का आयोजन एक पीढ़ी में एक बार किया जाता हैं जिसे “शान्द” कहते है जिसमें “लिम्बोर नृत्य” के साथ शस्त्रों की पूजा की जाती है I
कोइलू देवता की पूजा अराधना के लिए कोई विशेष पद्दति नहीं है केवल जागरण दिया जाता है और जब शिरगुल महाराज को चढ़ावा देते हैं तो उसी समय कोईलू को भी चावल या आटा अर्पित किया जाता हैं I इसके अतिरिक्त चार-वीर, ख्वाजा, हेड़, आदि को संतुष्ट करने हेतु आटे के रोट अर्पित किये जाते हैं I
देव समितियां: हर देवता के कार्यों और पूजा पद्दतियों को निष्पादित करने के लिए देव समितियां गठित रहती है चूंकि ये वंशानुगत होती हैं इसलिए इसे हर वर्ष गठित करने की आवश्यकता नहीं रहती है I सभी देव समितियां के अगवाल गाँव के नम्बरदार को माना जाता है I
मंदिर के कार्यों का संचालन करने के लिए एक समिति गठित हैं जिसमे ‘माली’ (उतारीक, गुर), ठाणी, पलगार, भंडारी, पुजारी और गणमान्य सदस्य देव समिति में विद्यमान रहते हैं I किसी भी देव समिति में कोई महिला सम्मिलित नही होती हैं I
यह समिति होने वाले देव कार्यों के सन्दर्भ में आवश्यक निर्देश या सुझाव देती हैं और निर्धारित देव परम्पराओं का पालन करने के लिए कदम उठाती हैं I किसी विवाद की स्थिति में भी ये देव समितियां ही अंतिम निर्णय लेती हैं और इनका निर्णय अंतिम होता हैं बल्कि कई मामलों में देवता भी इनका परामर्श लेते हैं I
उपचार व चिकित्सा : घरेलु उपचार व चिकित्सा पद्दति को आज भी हर गाँव में प्राथमिकता दी जाती है I गाँव के अपने वैद्य हैं जो स्थनीय जड़ी-बूटियों की जानकारी रखते हैं और मुफ्त में मरीजों का उपचार करते हैं I बुखार होने पर जैसे हरड का सेवन, सर्दी जुकाम होने पर कचूर का काढ़ा, अपाच्य होने पर या फिर पेट में अफारा बनने पर भी कचूर का लस्सी के साथ काढ़ा बनाकर दिया जाता हैं I शरीर में छोटा घाव होने पर रक्त बहाव को रोकने के लिए बिछु बूटी या कटुवा पत्थर को पीस कर लगाया जाता है I
बच्चों की आँख दुखने पर या निरंतर पीक पड़ने पर माँ का ताजा दूध डाला जाता हैं I सिर दर्द होने पर भी कचूर और गुड़ का काढ़ा पिलाया जाता है I शरीर की अन्दुरुनी चोटों के लिए दूध और हल्दी का मिश्रण दिया जाता हैं I पाँव मुड़ने या मासपेशियों में दर्द होने पर गुड़ और कच्ची हल्दी को साथ पीसकर कपडे की पट्टी द्वारा दर्द वाली जगह पर लगाया जाता है I दस्त या पेचिस लगने पर दही के साथ ‘सूर’ (स्थानीय शराब) दी जाती हैं I दांतों और मसूड़ों की दर्द को ठीक करने के लिए अखरोट या टिम्बुर की दान्तुन की जाती हैं I
पशुओं को चोट लगने पर या टांग मुड़ने पर या टूटने पर नौने के वृक्ष या बीऊल के वृक्ष की छाल लकड़ी की फटियों के साथ बाँधी जाती है I साँप या कुत्ते के काटने पर किसी जानकार व्यक्ति द्वारा पानी ‘मतराणा’ करके पीड़ित को सात दिन तक हर रोज़ पिलाया जाता है I छोटा बच्चा यदि किसी पशु या पालतू जानवर से डर जाए तो उस पशु या पालतू जानवर के शरीर से बाल निकाल कर बच्चे के सिर पर सात बार एक तरफ और दो बार उसके विपरीत घुमाकर जलती आग में डाले जाते हैं ताकी जलने से निकलने वाली गंध बच्चे की नाक तक पहुँच सके I यदि बच्चा पानी के पास किसी स्थिति में डरा हो तो उसे उसी नाले के पास आटे का रोट बनाकर पूजा जाता है I
खांसी होने पर शहद के साथ अजवाइन या हरड पीस कर दिया जाता है I यदि घर में सांप घुस जाए तो उस स्थिति में उसे घर से बहार निकालने के लिए ऊनी वस्त्र जलाकर घर में धुंआ किया जाता है ताकी ऊन के जलने की गंध से सांप बहार निकल जाए I पालतू पशुओं के शरीर से परजीवियों के उपचार हेतु देवदार की जड़ों से कैलों (सीडार तेल) निकाल कर लगाया जाता हैं I
फसलों में सड़न रोग लगाने पर गौ मूत्र का छिडकाव किया जाता हैं और सब्जी की बेलों में सड़न रोग लगने पर पानी में सोने का गहना डालकर उस पानी जिसे “सुन्वाणी” कहते है, छिड़काया जाता है I जोड़ों के दर्द को ठीक करने के लिए ‘शिंगे’ लगवाई जाती है जिसमें शिमल पेड़ की फली को घर में रखे पशु के सींग को गर्म करके घुटनों में सेंक लगाया जाता है I पाँव में यदि काफी गहरा कांटा चुभा हो जो सुई से न निकल रहा हो तो उस स्थिति में “फेगुड़े” का दूध और गुड़ लगाकर रात भर पट्टी बांधी जाती है और सुबह तक काँटा स्वत: ही पीक की साथ निकल जाता हैं I
सामाजिक प्रथाएँ: सामाजिक प्रथाएं ग्रामीण समाज का दर्पण हैं जिससे गाँव की सामाजिक आचार-व्यवहार का पता चलता है I गिरिपार के अधिकतर गाँव की 90% जनसंख्या मासाहारी हैं और हर घर में भातियोज के दिन बकरा काटा जाता है I हाटियों के गाँव में आल या बेडा सामाजिक इकाई का आधार है और सगोत्रीय विवाह स्थापित नहीं किये जाते हैं I
लेकिन विगत समय में मामा की बेटी के साथ विवाह करना बुरा नहीं माना जाता था और दादी और माँ अपनी मायके की भतीजियों से अपने बेटों के विवाह स्थापित करने में प्राथमिकता देती थी हालांकि अब परिस्थितियाँ बदल चुकी है I समाज में कार्यों का वर्गीकरण भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है जिसमें गाँव के सभी समुदाय निर्धारित सामाजिक परम्परा अनुसार कार्य करते थे I यदपि आधुनिकता और शिक्षा के प्रचार-प्रसार से व्यवसायों का लोप हुआ हैंI यहाँ के ग्रामीण परिवेश में बणिक या व्यापारी वर्ग सदैव ही अनुपस्थित रहा है I
गाँव का समाज सरल और जटिलता का सम्मिश्रण हैं I जहाँ एक और विभिन्न जातियों के लोग गाँव में परस्पर सौहार्द पूर्वक रहते हैं वहीं जातिगत पद्सोपान भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है I यद्यपि एक ही गाँव में खश/खोश, भाट, ढाकी, बाड़ी, कोली, चनाल, डूम, देवा, डेटी आदि उप-जातियों के लोग निवास करते हैं I
जातिगत पद्सोपान में भाट, खोश, देवा, डेटि को ऊपरी जातियां मानी जाती है I खोश और देवा के मध्य परस्पर रिश्तेदारी और वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित होते हैं I डेटि और भाट के मध्य भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हैं I
मध्य क्रम में ढाकी, बाड़ी, कोली आदि जातियां आती है I ढाकी और बाड़ी जाति के मध्य रिश्तेदारी और वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित है लेकिन कोली, डूम और चनाल जाति के लोगों के वैवाहिक सम्बन्ध केवल अपनी ही जाति में स्थापित है I डूम और चनाल जातिगत पद्सोपान में सबसे नीचे पायदान में आते हैं I
धारणाएँ, मान्यताएं एवं आस्थाएं: घर से बहार निकलते वक्त यदि किसी ने छींक मार दी तो इसे अशुभ माना जाता है और जाने वाला व्यक्ति कुछ देर के लिए बैठ जाता है I सांप द्वारा या बिल्ली द्वारा भी रास्ता काटना अशुभ माना जाता है I कुत्ते का रोना अशुभ माना जाता है और कहीं मातम छाने के अपशगुन के संकेत माने जाते हैं I घर की ढलवां छत के मध्य भाग पर यदि कौवा बोलता है तो इसे भी अशुभ संकेत माना जाता हैं I
यदि बकरी पिछली दो टांगो के सहारे बैठती है या फिर सूर्यास्त के बाद मुर्गा बांग देता है या फिर ओबरे में रात को बार-बार पशु रंभाता है तो इसे भी अपशकुन माना जाता है I सपने में मरे हुए व्यक्ति का दिखना या फिर गाँव के किसी जीवित व्यक्ति के बारे में बुरा सपना देखना भी अशुभ माना जाता हैं I
“छूड़ राहुआ छूड़, तीलो माशअ लोए जा खार, छूड़ राहुआ छूड़, तू जा साती समुदअ पार”
अर्थात राहू सूर्य को छोड़ दे और इसके एवज में तू तिल और माश की एक खार (१६ किलोग्राम) ले जा और सात समुद्र के पार चला जा I ग्रहण के समय गर्भवती महिला को और छोटे बच्चे को घर से बहार निकलने की मनाही है I बने हुए खाने पर मिटटी की मुट्ठी रखी जाती है I
सुतक के समय परिवार का कोई भी सदस्य न तो देवालय जाता है और न ही अदरक के खेत में जाता हैं I सुतक वाले घर में कोई भी पुरुष सदस्य 13 दिन तक प्रवेश नहीं करता हैं I सुबह चुल्हा जलाने से पहले गौमूत्र से लीपा जाता है और घर के हर कमरे के मध्य भाग में गोऊ मूत्र का छिडकाव किया जाता है जिसे ‘छोड़ा’ कहते हैं I
रात को सोते हुए पश्चिम दिशा की ओर छत में बनी सिनाली/सिन्द्वाली (रोशनदान) को हमेशा ही बंद किया जाता है I लोक मान्यता है कि इस दिशा की ओर से बाण लगने का प्रकोप रहता हैं जो कभी असुरी शक्तियों द्वारा छोड़े गए हैं I
हर माह की संक्रान्ति के दिन रात के भोजन से पहले घी का दीपक जलाया जाता हैं और यदि किसी के घर में “पापडा” होता है उसे जिमाया जाता है I घर की विवाहिता लड़कियां अपने मायके आकर “पाप/पापड़ा” को जिमाने के लिए चावल का नमक व मीठे रहित भात बनाते हैं और प्रसाद के रूप में घी के साथ सबको वितरित किया जाता है I
हाटी जनजाति में दोष, लाठो, पाप, गणाद, मशाणीया, जिंगार, चौन्ले आदि में भी लोक आस्था रखते हैं I बंधुओं और पूर्वजों के दोषों के निवारण हेतु उतारीक/गूर/मालियों की सहयता ली जाती हैं I कई दोषों के निवारण हेतु बन्धु पक्षों को हरिद्वार तक या पावा/पैह्वा तक जाते हैं I
किसी की असमायिक मृत्यु होने पर या फिर आत्महत्या के मामलों में मशाणीया बनाया जाता है जिसके माध्यम से उसकी आत्मा को विशेषज्ञता प्राप्त पंडित बुलाकर वार्तालाप करके असमायिक मृत्यु का कारण जानने का प्रयास करता है I किसी के साथ अन्याय करने पर मृत्यु पश्चात उसका पाप/पापड़ा उत्पन होता है और घर में अन्याय करने वालों के खिलाफ परेशानी खड़ी करता हैं I
अगर कोई बलशाली व्यक्ति दुर्बल को वेबजह सताता है तो दुर्बल व्यक्ति बलशाली के विरूद्ध देवालय जा कर विचार काटता है जिसे ‘जिंगार’ कहते हैं और बलशाली को देव दोष लगने पर दुर्बल की सत्यता सिद्ध होती है I जब कोई व्यक्ति किसी परिवार के विरुद्ध गुप्त रूप से तांत्रिक की सहायता से षड्यंत्र रचता है और विरोधी घर के किसी कोने में तान्त्रिक अनुसार कुछ मूर्तियाँ या बुझे अंगारें दबाता है जिन्हें केवल विशेषज्ञता प्राप्त पंडित ही खोज सकते है उन्हें “गणाद’ कहते हैं I
किसी की बुरी नज़र उत्तराने के लिए लाल मिर्च को सिर पर फेरा जाता है और जलते चूल्हे में फैंका जाता है I जब विवाहित लड़की अपने मायके में पहली बार अपने छोटे बच्चे को लाती है तो बच्चे की नानी “कुकुआ” (बिच्छो बूटी) के पत्ते पर आटा रख कर बच्चे पर घुमाया जाता है जिसे “अवाँरना” कहते हैं, फिर उसे पानी की घड़े के नीचे रखा जाता है I यदि पहला बच्चा बेटा है तो मामा की तरफ से डांगरा या बकरा दान में दिया जाता है I
घर से किसी विशेष कार्य के लिए जाते समय महीला नगे सिर नहीं बैठती हैं I पहनने के कपडे धोने और महीला द्वारा सिर के बाल धोने के लिए दिन सुनिश्चित होते हैं I मंगलवार और वीरवार के दिन यह कार्य वर्जित है I किसी कार्य विशेष को पूरा करने के लिए घर से बहार निकलने के लिए रविवार का दिन सबसे अच्छा माना जाता है लेकिन शोक प्रकट करने के लिए रविवार के दिन नहीं जाते हैं I
किसी बात की सत्यता जानने के लिए या फिर चोरी की पुष्टि करने के लिए जिन्दाऊल, तिरींण, नीम, आदि विधियों का भी प्रचलन है जिसमें संदिग्ध से चावल के दाने मांग कर देवालय में विचार काट कर चढ़ाया जाता हैं I नीम और तीरींण भी दोनों पक्षों में सुलह का एक तरीका है इसमें एक व्यक्ति देवालय के मुख्य कक्ष के दरवाजे को खोलता है और दूसरा यह विचार काटते हुए बंद करता है कि दोषी व्यक्ति को देवता खुद दण्डित करेगा चाहे इसके लिए एक पीढ़ी ही क्यों न लगे I
सावन के महीने में बैलों को खेतों में हल चलाने के लिए नहीं जोता जाता है I विवाहिता द्वारा पहले सावन के महीने अपने मायके में ही रहने का प्रचलन है I यदि किसी को अचानक शरीर में दर्द उठता है तो उस स्थिति में भी घर में बकरी या बकरा या फिर खाडू/मेढ़ा पीड़ित के सिर पर घुमाया जाता है और निवारण हेतु विचार काटा जाता है कि यदि कोई बुरी दृष्टा या फिर ‘लागीच” है तो देवता की पूछ करने तक सारी पीड़ा को ये बकरा या बकरी या फिर मेढ़ा हर लें I बाद में देवता से दोष हेतु निवारण का रास्ता पूछा जाता है I
किसी मृतक के दाह संस्कार पूर्ण होने पर वापिस लौटते हुए “चलो घर वापिस’ शब्द बोलने अशुभ माने जाते हैं क्योंकि ये शब्द सुनकर मृतक की आत्मा वापिस आने की सम्भावना रहती है I कई घरों में एक गाय केवल देवता के नाम से पाली जाती है जिसे “देओटे’ कहते हैं और उसका दूध केवल पीने के लिए या दही बनाने के लिए इस्तेमाल होता है लस्सी या मक्खन या घी बनाने के लिए नहीं I कई मामलों में एक खेत भी “देवड़ा” के रूप में छोड़ा जाता हैं यदि किसी प्रकार का दोष या क्लेश उस भूमी पर हो I
संध्या के समय सोना और दरवाजे के बीच में बैठना भी अशुभ माना जाता है I आज भी लोग यहाँ छींग, बांजा, पाप, लागीच, बाण, मात्री, नीम, लोटा-लूण, गणाद, चौंले, लाठो, डाग, डागुरा, दृष्टा, भाख, जिन्दाऊल, बोंध जैसी लोक मान्यताओं में आस्था रखते हैं I लोग पंडित, पाबुच, भगनाण, माले, ऊतारीक, ठाने द्वारा बताए गए उपचार पर आस्था रखते हैं I
जन्म के समय पाबूच लग्न राशी के हिसाब से नाम का अक्षर सुझाते हैं और तेरह दिन के बाद ही विवाहित लड़की के मायके से सोइतो (खाना-पान घी, गुड, आदि) लाया जाता है I गाँव में देवता के मंदिर में दो बार नबद बजाई जाती है एक बार सांय 8 बजे और सुबह 4 बजे जिसके सन्दर्भ में ऐसी लोक मान्यता है कि सायं की नबद के बाद से और सुबह की नबद तक देव-देवियाँ अपने स्थान पर आराम करते हैं इसलिए उस समय बुरी शक्तियों का अधिक प्रभाव होता है और लोगों को अपने घरों से ही रहना चाहिए I
महिलाओं की स्थिति: महिलाओं की स्थिति सामाजिक रूप से काफी स्वतंत्र रही है I अपने पसंद का वर चुनने के लिए लड़की स्वतंत्र हैं लेकिन वर सजातीय हों I रिश्ता पक्का करने के लिए वर के पिता वधू के घर जा कर एक रुपया भेट करता है जिसे ‘साए छोड़ना’ कहते हैं I यदि लड़की उसे उठा लेती है तो रिश्ता स्वीकार्य समझा जाता हैं I
स्त्री धन के रूप में विवाहिता के पास अपने थोड़े से जैवर-गहने होते हैं जो विवाह के समय मायके और ससुराल से प्राप्त होते हैं चूँकि इस समाज में दहेज़ का प्रचलन कभी नहीं रहा I दहेज़ के नाम पर कांसे की थाली, गिलास, दराती और बछड़ी दान स्वरुप दी जाती थी यदपि आज कुछ स्वरुप बदल गया हैं I
इस गाँव में बारात का प्रचलन लड़की की ओर से रहा हैं और विवाह के समय लड़की अपने साथ अपने गाँव के लोगों को ले जाती हैं जिन्हें जाजडू/झाजडू कहते हैं और लड़की के ससुराल में इनका स्वागत ढोल-नगाड़े सहित बकरा काट कर किया जाता है I आज भी परस्पर पारिवारिक सहमति से बिना किसी न्यायालय के हस्तक्षेप से वैवाहिक सम्बन्ध विच्छेद करना सरल और मान्य हैं जिसमें दोनों पक्षों के मौजिज लोग लिखत प्रदान कर पति-पत्नी के वैवाहिक जीवन विच्छेद को मान्यता देते हैं I
हाटी लोक परिधान एवं परम्परागत गहने
काल गणना : हाटी लोक समाज में काल गणना चंद्रमा की स्थिति द्वारा निर्धारित होती है और एक वर्ष में 365 दिन होते हैं I एक महीने में 30/29/28/या 31 दिन होते हैं एक वर्ष में बारह महीने होते हैं और पहला महीना चैत्र होता है I एक महीने में दो पखवाड़े और चार अठ्वाड़े होते हैं I बार से बार को अठवड़ा माना जाता हैं I
एक दिन में आठ पहर माने जाते हैं-चार दिन के और चार रात के I सुबह दिन खुलने का समय “बियाणु” यानी शुक्र ग्रह के पूर्व दिशा में दिखने से माना जाता है और लगभग आठ बजे तक “झीश” (सुबह) दो पहर बीत जाने के तक “दोपार” मतलब दिन का मध्यान, “बियाल्क्को” मतलब दिन ढलने का समय और ‘सोंद” का मतलब संध्या का समय माना जाता है I
ग्रामीण न्याय व्यवस्था: गिरिपार के गाँव समाज का सस्ता खुम्ब्ली न्याय आज भी विवाद को सुलझाने का सबसे लोकप्रिय तरीका है I दंडस्वरूप 6रू०, 12रू० 24रू० या अधिकतम 100रू० दोषी से वसूला जाता है I पञ्च लोग ‘बिष्टाला’ (नाम मात्र की फीस) लेते हैं और खुम्ब्ली आयोजित करने से पहले गाँव के ढेमेदार (सूचना देने वाला) को 2रू० ‘नल्सना’ (अग्रीम राशी) देना होता है I
यदि सम्पूर्ण गाँव की खुम्ब्ली में ही दोषी व्यक्ति अपना गलती या गुनाह स्वीकार करें तो उस पर बकरा और गाँव का ठीला दंडस्वरूप लगाया जाता हैं यदि इसके बाद भी वह न माने तो उसे बांजा (सामाजिक बहिष्कार) लगाया जाता है I ग्रामीण न्याय व्यवस्था में नम्बरदार की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है इसके अलावा बेड़े या आल न्याय व्यवस्था को प्रभावित करते हैं I दंड राशी और दंड का स्वरुप सदैव व्यक्ति की हैसियत अनुसार लगाया जाता है I
लोक साहित्य
लोक गाथाएँ: हाटी लोक समाज लोक गाथाओं से समृद्ध है और यहाँ पर अनेक लोक गाथाएँ प्रचलित हैं जैसे-जुवाऊ-थोबौउ की वीर गाथा, झोकटीयाल की लोक गाथा, सिंगटोऊ-ठिंडाऊ की लोक गाथा, परोटिया, बीणी, कमरौउ-सेवागो, सिंगटोऊ-अन्ज्वाल, ओछबू सियाणा, सोएंणे का सामा, सोबने की हारूल आदि I इसके अतिरिक्त ‘बीरसु’ वीर गाथा है जिसमें महासू के बीरसु वीर के साहसिक कार्यों का वर्णन आता है जिसने अपने प्राणों की आहुति देकर महासू महाराज के अनाज एकत्र करने वाले पाथे को बचाने के लिए नदी में छलांग लगाई थी और अपनी जान गवांकर भी इसे नदी से बहार निकालने में कामयाबी पाई थी I
‘राजा भरतहरी’ में राजा के त्याग और सम्पर्पण का उल्लेख है इसी तरह से सियाहरण में राम और रावण के युद्ध का उल्लेख किया जाता है I राम-रावण का ‘जोद्ध’ (युद्ध) कोंरू-पांडू का जोद्ध (कौरव-पांडव का युद्ध) के अतिरिक्त लोक गाथाओं में भींऊरी मार्मिक गाथा, सुबनी लोक गाथा, मनसो, जीता-गाज़ण आदि प्रचलित हैं जिन्हें सम्पूर्ण गिरीपार क्षेत्र में गाई जाती हैं I
लोक नाट्य: गाँव में दियाली/मशराली/बूढी दियाली के अवसर पर हास्यस्पद लोक नाटकों का प्रदर्शन होता है जिसमे व्यग्यात्मक रूप से अच्छा लोक सन्देश देने की वकालत की जाती हैं I गाँव के कुछ युवा कलाकार स्थानीय वेश भूषा में कई नाटक प्रस्तुत करते हैं जिन्हें लोक गीतों के अंतरालों के मध्य पेश किया जाता हैं जिन्हें खेल्टू/खैल/स्वांग कहते हैंI गाँव में रामायण का भी लोक मंचन किया जाता रहा है I इसमें लयबद्ध तरीके से रामायण के दोहे/चौपाइयां वांचे जाते हैं जैसे- रजा दशरथ कैकयी से कहते हैं: रानी –रानी सोती है कि जागती है ? तो कैकयी जबाब देती है-न तो सोती हूँ न जागती हूँ अपनी किस्मत पर रोती हूँI
कई अवसरों पर राजा हरिश्चन्द्र नाटक का विमोचन भी किया जाता रहा हैं जिसमें राजा हरीशचन्द्र का सत्यता और ईमानदारी की मिसाल को लोक मंचन के माध्यम से लोगों तक पंहुचाई जाती रही I कुछ गाँव में बूढी दियाली में प्रदर्शित किया जाने वाला चुरियाल्टू खैल, अति लोकप्रिय हैं जो गिरिपार के केवल चुनिन्दा गाँव में प्रदर्शित किया जाता हैंI
इसमें दो व्यक्ति तवे से जाली अपने मुंह पर लगते है ताकी पहचान न हो सके और केवल निक्कर पहने हुए शरीर पर तवा और चिमटा बांधा जाता हैं कुछ बच्चों को एक किल्टे में सोने का स्वांग करते हैं और उक्त दोनों व्यक्ति ढोल की थाप पर गाने के साथ उन बच्चों के कपड़े और अन्य चीजों को चुराते हैं इस लिए इसे चुरीयालो कहते हैं I दियाली के अंतिम दिन बुडीयाचु आते थे और ‘बुडाह’ नृत्य किया जाता था I
लोक गीत: लोक गीतों में कई प्रकार के गीत शामिल हैं जैसे-प्रेम गीत, व्यंग्यात्मक गीत, वीर गीत, विरह गीत और मार्मिक गीत आदि I गंगी और भाभी प्रेमरस भरे गीत है जिन्हें लड़के और लड़कियां अक्सर समूह में गाते हैं और एक दूसरे को अपनी भावनाएं व्यक्त करने का माध्यम भी रहता है I
झूरी (झोरे) एक प्रकार का व्यंगात्मक गीत है जिसमें गायक अक्क्सर सामूहिक लोक गीतों में गाता हैं I इसमें आधुनिक नवजवानो की माली हालत पर टीका टिप्पणी की जाती हैं और बुजुर्गों के शान और अच्छे समय का ज़िक्र किया जाता है I लामण और झांगे विरह को दर्शाने वाले लोक गीत हैं जिसमें गाँव में आये मेहमानो और विवाह के बाद वापिस जाने वाले जाजडुओं के विछड़ने के अवसर पर गाये जाते हैं I इसमे एक तरफ लडके और दूसरी तरफ से लड़कियां गाती हैं I
“छोड़े’ हास्यस्पद लोक गीत हैं जिसमें पुरुष-महिला एक दुसरे के विरुद्ध टीका-टिप्पणी करते हैं I इसके अतिरिक्त कई बार गाँव में असमयिक होने वाले घटनाओं को भी लोक गीतों में पिरोया जाता है I
लोक गीतों में महिला भागीदारी
बूढी दियाली की अमावस्या की रात को मशाल के साथ गाए जाने वाले गीत फूहड़ता से भरे होते हैं और केवल पुरुष ही इसमे सम्मिलित होते हैं I इसका एक उद्देश्य पौरुषत्व को जगाना है और दूसरा उद्देश्य शीतऋतु की ठंडी रात्रि में पुरुषों को घर से बहार निकलने के लिए वाध्य करने का एक ढंग है I
लोक गीतों में “सियारहण” भी मशहूर हैं जिसे दो अलग अलग शैलियों में अक्सर रात खुलने के समय गाया जाता है नाटी गीतों में और तांद/लाम्ब में भी I छोबकू/छब्कुटे एक और लोकप्रिय हास्यस्पद गीत है जिसमें गायक गाँव के युवक-युवतियों पर उनकी काम न करने की मानसिकता पर कटाक्ष करते हुए सिमटती खेती और पशु धन की व्यथा बताता है I
नृत्य एवं नाटियां : बुढा नृत्य सबसे प्राचीन लोक नृत्य माना जाता है जिसे बूढी दियाली के जोंदोई की शाम को बुडियाचु द्वारा प्रस्तुत किया जाता था जिसमें ‘चौलणे’ पहन कर बूढा-बूढी के रूप में हुड़क की थाप पर नृत्य करते थे यदपि अब यह लुप्त प्राय हो गया है I इसकी प्रमुख पंक्ति इस प्रकार है:
बूडो भाई कैथे शो आओ... बूडो भाई कैथे शो आओ I
बूडो भाई नदी पारो शो आओ.. बूडो भाई नदी पारो शो आओ II
(अर्थात बूढ़ा जोड़ा कहाँ से आया और कहाँ जाएगा ...बूढा जोड़ा नदी पार से आया और वापिस नदी पार ही जाएगा I )
हाटी का विश्व प्रसिद्द भड़ालटू नृत्य
नाटी नृत्य अक्सर सामूहिक रूप से बैठ कर गाये जाने वाले गाने पर किया जाता है और दो या तीन जोड़ी केवल पुरुष गीतकार बैठते हैं बीच में खाली जगह छोड़ी जाती हैं जहाँ नाटी करने वाले नाच सके I कई बार नृत्य करने वाला व्यक्ति खुद ही गीत गाता है और बैठे हुए गायक उस कलाकार के पीछे गीत के अन्त्तरों को दोहराते हैं I
नाटी में कई बार युगल में भी नृत्य होता हैं जिसमें पति –पत्नी नृत्य करते हैं या फिर परिवार के सभी सदस्य भी एक साथ नृत्य करते हैं जिसमें ससुर-बहू, सास-दामाद, पिता-बेटी, भाभी-देवर आदि सम्मिलित होते है यानी किसी प्रकार की बंदिश नहीं होती है I सामूहिक नृत्य में हारुल गायन पर कभी-कभी तलवार और ढाल से भी नृत्य किया जाता है जिसमें गाँव का बुजुर्ग अपनी कला बाजियां दिखता हैं I
हारुल नृत्य में एक से ज्यादा लोग भी एक साथ नाचते हैं I रासा/रासो नृत्य हारुल या वीर गाथा पर ही किया जाने वाला नृत्य है जिसमें एक-दूसरे की बाजुएँ पीछे की तरफ पकड़ सटक कर खड़े होते हैं और ढोल की थाप पर कदम से कदम मिलाकर चलते हैं I कई बार आगे चलने वाला व्यक्ति हाथ में डांगरा या तलवार लेकर नृत्य पंक्ति का नेतृत्व करता है I इसमे अक्सर पुरुष ही ज्यादा भाग लेते हैं लेकिन वर्तमान में महिलाएं भी सम्मिलित होती हैं लेकिन गायन केवल पुरुष द्वारा ही किया जाता हैं I
तांद नृत्य आम लोक गीतों पर किया जाने वाला पंक्ति का नृत्य है जिसमें समिमिलित होने वाले लोग एक दूसरे की भुजाएं आगे की तरफ पकड़कर ढोल की थाप पर कदम से कदम मिलाकर चलते हैं I इसमे अक्सर युवक एक अलग तांद और युवतियां अलग तांद बनाते हैं और कदम की मुश्किल चाल से एक दूसरे को मात देने का प्रयास करते हैं I
“मन गी” एक ऐसा नृत्य हैं जिसे केवल ढोल, दुमानो, नगाड़े, ताली और करनाल की तालों और धुनों पर किया जाता हैंI इसमें समूह में सभी उपस्थित लोगों द्वारा एक साथ थिरक कर नृत्य किया जाता है और किसी प्रकार की गायकी का इस्तेमाल नहीं होता है I इसे अक्सर या तो पर्व या उत्सव की समाप्ति पर किया जाता है और बार बार दुहराया जाता है कि-“सदा रो चेई एशो ओ” अर्थात हमेशा ऐसा संगीतमय रहना चाहिए I
विरसु नृत्य अक्सर एड़ी की थाप पर किया जाने वाला वीर नृत्य हैं जिसमें हृष्ट-पुष्ट शरीर वाले चार-पांच व्यक्ति एक साथ नाचते हैं और कमरे में उपस्थित अन्य पुरुष भी एडी की थाप साथ लगाते हैं I कई बार इस नृत्य में “खैल’ भी आती हैं I ‘घुन्डिया रासो’ एक अलग प्रकार का ही नृत्य हैं जिसमें दो जोड़ी नाचने वाले व्यक्ति एक दुसरे के कमर पर टाँगे फँसा कर साथ नाचते हैं I
‘लिम्बर नृत्य’ केवल ठारी की शांत के अवसर पर या महासू के जागरण पर किया जाता हैं और इसमें केवल पुरुष ही सम्मिलित होते हैं और हाथों में शस्त्र होते है थोड़े-थोड़े अंतराल बाद देव कांडी वाची जाती हैं और उस समय नृत्य करने वाले सभी लोग शांत होकर सुनते हैं और अंतिम शब्द के साथ उछल कर “लिम्बीरा” शब्द बोलकर नृत्य करते हैं I
“होजुरा” नृत्य केवल बिशु में किया जाता है जिसमें एक जलुसू के रूप में ठारी देवी के प्रांगण से गाँव के पुरुष निकल कर ढोल और दुमानो की थाप पर “होजुरा..होजुरा” बोलते हुए नाचते है I एक व्यक्ति जिसकी आवाज दमदार और भारी हो फूहड़ शब्दों में कांडी बोलता है जिसे ‘जीरू’ कहते हैं I मौण में किया जाने वाला नृत्य लिम्बर और होजुरा नृत्य से भिन्न होता था लेकिन अब मौण पर्व ही बंद हो गया है I
नाटी के प्रकार: नाटी के भी कई प्रकार लोकप्रिय है जैसे-एकल नाटी, युगल नाटी और सामूहिक नाटी आदि I एकल नाटी या तो मुजरे में लगाई जाती है जिसमें नाचने वाला अपनी पसंद का गीत गवाकर नाचता है I सामूहिक नाटी में शौकीन लोग एक साथ एक ही गाने में नाचते हैं I कई अवसरों पर दोनों हाथो में थालियाँ लेकर भी नाटी की जाती है जिसे थाली नृत्य कहते हैं I नाटियों में बाजुओं, कमर, कन्धों के साथ-साथ पाँव की गति में सामजस्य आवश्यक है जबकी रासा, तांद में क़दमों की गति में सामजस्य बिठाना जरूरी है I
लोक कथाएँ : लोक कथाओं में “सुकसेली” की हास्यस्पद और व्यंगात्मक कथाएँ मक्की के दाने अलग करते हुए सुनाई जाती हैं। सुकसेली एक प्रकार का पहाड़ी शैख़चिली का चरित्र वर्णन है जिसमें उसकी तेज और हाजिर जबाब योग्यता को सुनाया जाता है। इसके अतिरिक्त पहाड़ी शैली में रामायण और महाभारत के प्रसंगों को भी लोक कथाओं के माध्यम से सुनाया जाता है।
लोक कहावतें (ओनाणे): ये अनुभव और वास्तविकता का निचोड़ हैं। कुछ प्रमुख कहावतें इस प्रकार हैं:
- 1. “बूढा खाला जूण, तअ कमाला कुण” - बुढ़ापे में जूण भर खाओगे तो कमाएगा कौन।
- 2. “खाल ने कोरी खोणीअ, टिम्बे ने कोरी चिणीअ“ - खाले और चोटियाँ कुदरत की देन हैं।
- 3. “जूणजी कोरी आणीअ, तेंखे पड़ो देणी बाणीअ” - जिसे वियाह कर लाया जाता है उसे कमा कर देना पड़ता है।
- 4. “भाइए भाए पाला, दाइए दाए गाला” - भाई भाई को पालता है, बाहरी व्यक्ति गिराने का अवसर ढूँढता है।
- 5. “दाई की मिश, माश ने आथी तअ कुल्थअ पीश” - दिखावे के लिए असली की जगह नकली का इस्तेमाल जायज़ है।
- 6. “पोइसे वाला टकटका, बिना पोइसे जकजका” - पैसे वाला फुर्तीला और बिना पैसे वाला सुस्त दिखता है।
- 7. “जे तअ पूजी तबे पाथरअ के बी देओ...” - आस्था है तो पत्थर में भी देव हैं, नहीं तो वह केवल दीवार का पत्थर है।
- 8. “सुते खे कालजो भेटदो ने” - सोए हुए व्यक्ति को लक्ष्य प्राप्त नहीं होता।
- 9. “राजा के माँ खे डाग कूँण बोलदा” - बलशाली को कोई बुरा बोलने की हिम्मत नहीं करता।
- 10. “पाथा पाया भअरे, शीअ खे गोआ डअरे” - थोड़े से अंतर से चूक जाना।
लोक पहेलियाँ (बुझावणे): ऊन कातते या मक्की निकालते समय मनोरंजन के लिए बुझाई जाने वाली पहेलियाँ:
| 1. आर बी झुला पार बी झुला, बीचअ ठाईं सियांर जिया फूला | दही से मक्खन बनाना |
| 2. कालू ऊटा पाचअ खे, पाचअ गोंए आए कालू ने आई | तवा रोटी |
| 3. ऐबी इथे ऐबी नदी पार | आँखें |
| 4. आमे बी खाव से बी खाव | बिच्छु बूटी (कुकुआ) |
| 5. पाँच ऊटे थागदे दू ए आणा | नाक साफ़ करना |
| 6. उरो बी ठुरु पुरो बी ठुरु... कथे मुखे ठाँव | ऊन कातने की तकली |
| 7. एकी गाँव दे आग लागे... चौऊथे गाँव दा धुंआ | चीलम (हुक्का) |
| 8. काले हांडे, कालो ही भात, सीऊ हांडीए, घुटा घाट | फेगुड़ा के पके दाने |
| 9. बिना फुल्टूए झोमका लागा | तिरमल का फल |