सामाजिक परिदृश्य (Social Landscape)
i) परिवार की संरचना- परिवार समाज की प्राथमिक इकाई रही है और यहाँ सयुक्त परिवार सदैव ही वांछित रहा I सयुंक्त परिवार में सबसे बड़े बुजुर्ग को ठगडा कहते हैं और परिवार के सभी निर्णय करता हैं और अन्य सदस्य उसके निर्णय को मानते हैं I धन की आकस्मिक आवश्यकता पड़ने पर भी ठगडा ही ऋण उठता हैं और वापिस करने के लिए भी वही उत्तरदायी होता हैं I इतना ही नहीं गाँव की पंचायतों में, खुम्बलियों में भी वही परिवार का प्रतिनिधित्व करता हैI पुरुष का दायित्व आय के संसाधनों को जुटाना हैं और परिवार का भरण पोषण करना हैI इस ग्रामीण समाज की एक और विशेषता है नातेदारी I यंहा चाचा, ताया, ताई, चाची आदि सम्बोधन को लोप हैं बल्कि बाबा/बोबा, माएं, आदि सम्बोधन ही ममरे नाना-नानी और पैतृक नाना-नानी दोनों के लिए एक जैसा ही प्रयोग किया जाता है I बड़े भाईयों को दादा और बहनों को दादी कहते हैं I
| हिन्दी में नातेदारी शब्द | हाटियों में प्रयुक्त नातेदारी शब्द |
|---|---|
| दादा | नाना |
| दादी | नानी |
| नाना | नाना |
| नानी | नानी |
| पिता | बाबा/बोबा |
| माता | मांए |
| बड़ा भाई | दादा |
| छोटा भाई | भाईया |
| बड़ी बहन | दादे |
| छोटी बहन | भाएटे |
| बुआ | बेबे |
| चाचा | कान्छा बाबा |
| ताऊ | जेठा बाबा |
| चाची | कांछी माए |
| ताई | जेठे माए |
| ससुर | शौउरा |
| सास | शाशु |
| पति | मालअक |
| पत्नी | बोईर/घरवाले |
| मामा | मौउला/मामा |
| फूफा | मामा |
| ससुराल | शराड़े |
इस गाँव के समाज में बहुपति प्रथा आज भी विद्यमान हैं और लगभग हर घर में जोड़ीदारी के एक या दो उदाहरण मिल जाते हैं जो की सयुंक्त परिवार व्यवस्था की एक मजबूत कड़ी मानी जाती हैं I यदपि वर्तमान में बहुपति प्रथा का प्रचलन बहुत कम हो रहा हैं I
विरासत प्रणाली
ii) विरासत प्रणाली- हाटी समाज में विरासत प्रणाली गिरिपार सिरमौर के सभी गाँव में अपनाई जाने वाली प्रणाली के समरूप हैं I सामान्य स्थिति में पैतृक सम्पति में घर के सभी पुरुषों का सयुक्त मालिकाना हक़ माना जाता हैं I बंटवारे की स्थिति में पैतृक सम्पति का विभाजन केवल भाइयों की संख्या के आधार पर होता हैं और बहनों को, चाहे विवाहित हो या अविवाहित, किसी प्रकार का हिस्सा नहीं मिलता है I यदि कोई व्यक्ति पुत्रविहीन ही अपनी सम्पति छोड़ता है तो पुत्रियों को विरासत मिलती हैं लेकिन विवाहित होने पर पुत्री के सबसे नजदीक नातेदार उस सम्पति की देखभाल करते हैं और उस पुत्री की आजीवन रिश्तेदार के रूप में सारी रस्में-रिवाज़ निभाते हैं लेकिन घर-जंवाई का प्रचलन कतई नहीं है और इसे समाज में बहुत ही बुरी दृष्टि से देखा जाता हैं I
यदि कोई व्यक्ति सन्तान विहीन मरता हैं तो उसकी सारी सम्पति उसके भाईयों को जाती हैं लेकिन उसका भाई भी जीवित नहीं है तो उसका निकट बंधु उसका हक़दार रहता हैं I सम्पूर्ण वंशज के खत्म होने पर उस परिवार का “उगलणा” कहते हैं और उस स्थिति में उसकी सम्पति कभी-कभार लावारिस रहती हैं तो उसे देवता के मंदिर को भेंट की जाती हैं I
परिवार में सामन्य बंटवारे की आवश्यकता पर जेठोंग और कान्छोंग की व्यवस्था रहती हैं जिसमें बड़े बेटे को जैठोंग और सबसे छोटे बेटे को कान्छोंग एक अतिरिक्त हिस्से के रूप में दिया जाता हैं I बड़े बेटे अक्सर सबसे बड़ा खेत और छोटा बेटा अक्सर पुश्तैनी मकान में प्राप्त करते हैं I घर का बड़ा वर्तन, अच्छा पशु, अच्छा वस्त्र आदि को भी बड़े बेटे का पहला अधिकार समझा जाता हैं I बंटवारे को बेड़े या आल के बुजुर्गों के समक्ष किया जाता हैं अचल सम्पति में बांटते हुए हिस्सों को पृथक करने के लिए पत्थर की बुर्जी लगाई जाती है जिसे ‘ओड़ा’ या ‘सियाना’ कहते हैं I
वर्तमान समय में कागजों में विभाजन हिन्दू उत्तराधिकार क़ानून, 1955 के अनुरूप होता हैं लेकिन व्यवहारिक रूप से परम्परागत प्रणाली ही कायम हैं क्योंकि आज भी न तो विवाहिता बहन या पुत्री वापिस अपने मायके आकर पिता या भाई की सम्पति में हिस्सा लेती है और न ही विधवा अलग होकर पति की सम्पति का बंटवारा चाहती है बल्कि सयुंक्त परिवार में ही वह स्वयं को ज्यादा महफूज़ और सुरक्षित मानती हैं I
जन्म-विवाह और मृत्यु से सम्बन्धित रिवाज एवं संस्कार
i) जन्म संस्कार- ग्रामीण समाज में संस्कार व रीति-रिवाज़ सदियों से चली आ रही लोक परम्परा पर आधारित हैं। गर्भवती महिला को शोक स्थल और भूत-प्रेतों वाले स्थानों पर जाने की मनाही होती है। नौवें महीने में वह मायके जाती है, जहाँ उसकी माँ उसकी पसंद के व्यंजन बनाती है। प्रसव ससुराल के ओबरे में ही गाँव की दाई (सुत्कियारी) द्वारा कराया जाता है। बच्चे के नामकरण पर बुआ द्वारा अखरोट, गुड़, चावल और तिल (चिन्चावले) बांटे जाते हैं और छन्द बोला जाता है: “चांदा मामा सूरजअ छूड़अ ला झाँव.....फलाणे के बेटे को अमरु नांव”।
ii) विवाह संस्कार- यहाँ विवाह के मुख्यतः तीन प्रकार प्रचलित हैं: जाजडा, हार और खिताय।
• जाजडा: यह सबसे प्रतिष्ठित विवाह है (99%)। इसमें बारात लड़की की तरफ से आती है जिन्हें जाजडू कहते हैं। गाँव के हर घर से एक पुरुष (टोलुवा) और एक महिला (रोटिआरे) काम में मदद करते हैं।
• हार: इसमें लड़का पसंद की लड़की को भगा कर लाता है, जिसे बाद में बुजुर्गों द्वारा दंड (बकरा और ठीला) लेकर सुलझाया जाता है।
• खिताय: यह तलाकशुदा महिला के साथ विवाह है, जिसमें होने वाला पति महिला के मायके के जरिए पहले पति को 'खीत' की राशि प्रदान करता है। इसके अलावा पुराने समय में 'बाला-विवाह' (बाल विवाह) का भी प्रचलन था।
iii) मृत्यु संस्कार- मृत्यु के समय सम्पूर्ण बेडा या आल शोक में रहता है। मृतक की सूचना देने जाने वाले को ‘काज़ू’ कहा जाता था, जिसे बदले में ‘काज़था’ (गेंहू और घी) दिया जाता था। शोक के दौरान हल्दी, तड़का और खेतों में बैल जोतना वर्जित होता है। शोक खोलने के समय रिश्तेदार घी की ‘लोट्की’ और माश का ‘सोला’ साथ लाते हैं। हरिद्वार में पिंड दान हेतु तीसरे या पांचवें दिन जाने की परंपरा है।
सामाजिक प्रथाएँ
i) सामाजिक प्रथाएँ- सामाजिक प्रथाएं ग्रामीण समाज का दर्पण हैं जिससे गाँव की सामाजिक अचार व्यवहार का पता चलता है I झकान्डो गाँव की 90% जनसंख्या मासाहारी हैं और हर घर में भातियोज के दिन बकरा काटा जाता है I इस गाँव में भी आल या बेडा सामाजिक इकाई का आधार है और सगोत्रीय विवाह स्थापित नहीं किये जाते हैं I लेकिन मामा की बेटी के साथ विवाह करना बुरा नहीं माना जाता था और दादी और माँ अपनी मायके की भतीजियों से अपने बेटों के विवाह स्थापित करने में प्राथमिकता देते थे हालांकि अब परिस्थितियाँ बदल चुकी है I
कार्यों का वर्गीकरण: समाज में कार्यों का वर्गीकरण भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है:
• खोश: सुरक्षा कार्य
• भाट, डेटि: देव कार्य
• ढाकी: बाज़गी, नाई और दर्जी का कार्य
• बाड़ी: बढ़ई का कार्य
• चनाल: मोची का कार्य
• डूम: टोकरी बनाने का कार्य
• कोली: मिस्त्री, काश्तकार, दर्जी, बुनकर और मृतक के समय लकड़ी एकत्र करने का कार्य
यदपि आधुनिकता और शिक्षा के प्रचार-प्रसार से व्यवसायों का लोप हुआ हैं I इस ग्रामीण परिवेश में बणिक या व्यापारी वर्ग सदैव ही गायब रहा है I गाँव का समाज सरल और जटिलता का सम्मिश्रण हैं I जहाँ एक और विभिन्न जातियों के लोग इस गाँव में परस्पर सौहार्द पूर्वक रहते हैं वहीं जातिगत पद्सोपान भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है I यहाँ खश/खोश, भाट, ढाकी, बाड़ी, कोली, चनाल, डूम, देवा, डेटी आदि उप-जातियों के लोग निवास करते हैं I
जातिगत पद्सोपान: जातिगत पद्सोपान में भाट, खोश, देवा, डेटि को ऊपरी जातियां मानी जाती है I खोश और देवा के मध्य परस्पर रिश्तेदारी और वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित होते हैं I डेटि और भाट के मध्य भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हैं I मध्य क्रम में ढाकी, बाड़ी, कोली आदि जातियां आती है I ढाकी और बाड़ी जाति के मध्य रिश्तेदारी और वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित है लेकिन कोली, डूम और चनाल जाति के लोगों के वैवाहिक सम्बन्ध केवल अपनी ही जाति में स्थापित है I डूम और चनाल जातिगत पद्सोपान में सबसे नीचे पायदान में आते हैं I
धारणाएँ, मान्यताएं एवं आस्थाएं
शुभ-अशुभ संकेत और अपशकुन: घर से बाहर निकलते वक्त छींक आना, सांप या बिल्ली द्वारा रास्ता काटना, कुत्ते का रोना और घर के सर्वोच्च बिंदु पर कौवे का बोलना अशुभ माना जाता है। यदि बकरी पिछली दो टांगों के सहारे बैठे, सूर्यास्त के बाद मुर्गा बांग दे, या ओबरे में रात को पशु रंभाए, तो इसे अपशकुन माना जाता है। बुरे सपने और संध्या के समय सोना या दरवाजे के बीच बैठना भी वर्जित है। दाह संस्कार से लौटते समय “चलो घर वापिस” बोलना अशुभ माना जाता है क्योंकि इससे मृतक की आत्मा के लौटने की संभावना रहती है।
ग्रहण और सूतक की मान्यताएं: सूर्य और चन्द्र ग्रहण के समय राहू के लिए तिल और माश अर्पित किए जाते हैं और जाप बोला जाता है—“छूड़ राहुआ छूड़, तीलो माशअ लोए जा खार, छूड़ राहुआ छूड़, तू जा साती समुदअ पार”। ग्रहण के समय गर्भवती महिलाओं और बच्चों का बाहर निकलना मना है। सूतक के समय परिवार का कोई सदस्य देवालय या अदरक के खेत में नहीं जाता और 13 दिन तक पुरुष सदस्य घर में प्रवेश नहीं करते। सुबह चूल्हा जलाने से पहले गोमूत्र से ‘छड़ा’ (छिड़काव) किया जाता है।
दोष निवारण और न्याय पद्धति: गाँव में दोष, लाठो, पाप, गणाद, मशाणीया, जिंगार और चौन्ले आदि में गहरी आस्था है। किसी के साथ अन्याय होने पर मृत्यु पश्चात उसका ‘पाप’ उत्पन्न होता है। यदि कोई बलशाली दुर्बल को सताता है, तो दुर्बल व्यक्ति देवालय जाकर ‘जिंगार’ (विचार काटना) करता है। चोरी या सत्यता जानने के लिए जिन्दाऊल, तिरींण, और नीम जैसी विधियों का प्रचलन है। तांत्रिक षड्यंत्रों का पता लगाने के लिए विशेषज्ञ पंडितों द्वारा ‘गणाद’ (दबी हुई मूर्तियाँ या अंगारे) खोजे जाते हैं।
पारिवारिक और देव रस्में: विवाहित लड़कियां मायके आकर “पाप जिमाना” रस्म हेतु स्वादहीन चावल बनाती हैं। जब लड़की पहली बार अपने बच्चे को मायके लाती है, तो नानी “कुकुआ” के पत्ते पर आटा रखकर “अवाँरना” रस्म करती है। कई घरों में एक गाय केवल देव के नाम से पाली जाती है जिसे “देओटे” कहते हैं, जिसका दूध केवल पीने या दही के लिए होता है, लस्सी या घी के लिए नहीं। इसी तरह किसी क्लेश निवारण हेतु खेत को “देवड़ा” के रूप में छोड़ा जाता है।
नबद और सुरक्षा: गाँव के मंदिर में शाम 8 बजे और सुबह 4 बजे नबद बजाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि शाम की नबद के बाद से सुबह की नबद तक देवता आराम करते हैं, इसलिए इस समय बुरी शक्तियों का प्रभाव अधिक होता है और लोगों को घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। लोग आज भी पंडित, पाबूच, भगनाण, माले, ऊतारीक और ठाणे द्वारा बताए गए उपचारों पर पूर्ण आस्था रखते हैं।
सामाजिक संरचना एवं न्याय व्यवस्था
i) महिलाओं की स्थिति- महिलाओं की स्थिति सामाजिक रूप से काफी स्वतंत्र रही है I अपने पसंद का वर चुनने के लिए लडकी स्वतंत्र हैं लेकिन वर सजातीय हों I रिश्ता पक्का करने के लिए वर के पिता वधू के घर जा कर एक रुपया भेट करता है यदि लड़की उसे उठा लेती है तो रिश्ता स्वीकार्य समझा जाता हैं I स्त्री धन के रूप में विवाहिता के पास अपने थोड़े से जैवर-गहने होते हैं जो विवाह के समय उसे प्राप्त होते हैं चूँकि इस समाज में दहेज़ का प्रचलन कभी नहीं रहा I दहेज़ के नाम पर कांसे की थाली, गिलास, दराती और बछड़ी दान स्वरुप दी जाती थी यदपि आज कुछ स्वरुप बदल गया हैं I इस गाँव में बारात का प्रचलन लडकी की ओर से रहा हैं और विवाह के समय लड़की अपने साथ अपने गाँव के लोगों को साथ ले जाती हैं जिन्हें जाजडू कहते हैं और लड़की के ससुराल में इनका स्वागत बकरा काट कर किया जाता है I आज भी परस्पर सहमति से बिना किसी न्यायालय के हस्तक्षेप से वैवाहिक सम्बन्ध विच्छेद करना सरल और मान्य हैं जिसमे दोनों पक्षों के मौजिज लोग लिखत प्रदान कर विच्छेद को मान्यता देते हैं I
ii) काल गणना- झकान्डो गाँव में भी काल गणना चन्र्द्मा की स्थिति द्वारा निर्धारित होती है और एक वर्ष में ३६५ दिन होते हैं I एक महीने में ३० या ३१ दिन होते हैं एक वर्ष में बारह महीने होते हैं और पहला महीना चैत्र होता है I एक महीने में दो पखवाड़े और चार अठ्वाड़े होते हैं I बार से बार को अठवड़ा माना जाता हैं I एक दिन में आठ पहर माने जाते हैं-चार दिन के और चार रात के I सुबह दिन खुलने का समय “बियाणु” यानी शुक्र ग्रह के पूर्व दिशा में दिखने से माना जाता है और लगभग आठ बजे तक “झीश” (सुबह) दो पहर बीत जाने के बाद “दोपार” मतलब दिन का मध्यान, “बियाल्क्को” मतलब दिन ढलने का समय और ‘सोंद” का मतलब संध्या का समय माना जाता है I
iii) ग्रामीण न्याय व्यवस्था- गाँव का सस्ता खुम्ब्ली न्याय आज भी विवाद को सुलझाने का सबसे लोकप्रिय तरीका है I दंडस्वरूप 6रू०, 12रू० 24रू० या अधिकतम 100रू० दोषी से वसूला जाता है I पञ्च लोग ‘बिष्टाला’ (फीस) लेते हैं और खुम्ब्ली आयोजित करने से पहले गाँव के ढेमेदार (सुचना देने वाला) को 2रू० ‘नल्सना’ (अग्रीम राशी) देना होता है I यदि सम्पूर्ण गाँव की खुम्ब्ली में ही दोषी व्यक्ति अपना गलती या गुनाह स्वीकार करें तो उस पर बकरा और गाँव का ठीला दंडस्वरूप लगाया जाता हैं यदि इसके बाद भी वह न माने तो उसे बांजा (सामाजिक बहिष्कार) लगाया जाता है I ग्रामीण न्याय व्यवस्था में नम्बरदार की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है इसके अलावा बेड़े या आल न्याय व्यवस्था को प्रभावित करते हैं I दंड राशी और दंड स्वरुप सदैव व्यक्ति की हैसियत अनुसार लगाया जाता है I