हाटी जनजाति, गिरिपार सिरमौर, हिमाचल प्रदेश

परिचय

भौगोलिक स्वरुप

पश्चिमी हिमालय में भारत का उत्तरी प्रांत हिमाचल अवस्थित हैं जिसका दक्षिणतम जनपद सिरमौर है I गिरि नदी द्वारा सिरमौर उत्तर-पश्चिम से दक्षिणी-पूरब दिशा में लगभग दो बराबर भागों में विभक्त किया गया है- गिरिआर तथा गिरिपार I गिरिपार के विषम भौगोलिक क्षेत्र के मौलिक निवासी हाटी कहलाते हैं जिन्हें 55 वर्षों के अविराम शांतिपूर्ण संघर्ष से संवैधानिक संशोधन उपरान्त 4 अगस्त, 2023 को हिमाचल प्रदेश की 11वीं अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता प्राप्त हुई है I हिमालय की बाह्य शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं के पादतलीय ढलानों में अवस्थित हाटी जनजाति शांति पूर्ण संघर्ष और सहनशीलता का पर्याय बन चुका है I सिरमौर का गिरिपार क्षेत्र हाटी समुदाय की कुल चौदह उप-जातियों का मूल निवास स्थान है जिसका कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 1299 वर्ग किलोमीटर है I सम्पूर्ण गिरीपार में 154 ग्राम पंचायते हैं I गिरीपार सिरमौर में राजगढ़, शिलाई, संगडाह की सम्पूर्ण तहसील, उप- तहसील नौहराधार, कमरऊ, रोनहाट, तथा पांवटा तहसील का आंज-भोज क्षेत्र समिलित हैI ये ही क्षेत्र गिरि नदी द्वारा शेष जिले से अलग किये जाते हैं और एक ही भूखंड में अवस्थित हैI इन क्षेत्रों की भौगोलिक एकरूपता के कारण ही एक जैसी सामाजिक-आर्थिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं का विकास हुआ हैI यह भी विदित तथ्य है कि इस इलाके में आदिम परम्पराओं का आज भी विद्यमान होना इस बात की और संकेत करता है कि यहाँ आज भी विकट भौगोलिक बिषमताओं को विजित नहीं किया जा सका हैI कठिन भौगोलिक स्थिति ने गिरिपार सिरमौर के लोगों को अपनी आजीविका के लिए सीढ़ीनुमा खेतों और छोटे आकार के पशुओं को पालने के लिए बाध्य कियाI जोतों का आकार बहुत ही छोटा होता है और कई परिस्थितियों में तो जोतें इतनी छोटी है कि बैल की जोड़ी से हल भी नहीं लगाया जा सकता हैI 99% कृषकों की जोतों का आकार 5 विश्वा से भी कम पाया जाता हैI

Sirmaur Map

सिरमौर जनपद का भौगोलिक मानचित्र

गिरिपार सिरमौर की तहसीलें/उप-तहसीलें

दुर्गम पहाड़ी भौगोलिक संरचना के कारण कृषि केवल वर्षा के पानी पर ही निर्भर हैI सिचाई के लिए किसी भी संसाधन का उपयोग संभव नहीं हैI यदि किसी कृषि भूमी में सिंचाई की व्यवस्था की भी है तो मीलों दूर खड्ड से पहड़ी को काट कर कुहल का प्रयोग किया जाता है जिसमें निरंतर श्रम की आवश्कता रही है और दिन रात लोगों को उसकी देखभाल करनी पड़ती हैI किसान निरंतर अथक प्रयास करके भी वर्ष भर दो जून की रोटी उपजाने में सफल नहीं होता हैI घास की पैदावार भी बहुत कम होती है चूँकि सम्पूर्ण भू-पर्पटी चटटानी है जिस पर महज़ चार से छः इंच तक ही मिट्टी की उथली परत हैI गिरीपार क्षेत्र में विद्यमान वनस्पति भी बिषम भौगोलिक संरचना एवं स्वरुप की और इंगित करती हैI चूँकि ये क्षेत्र शिवालिक पर्वतीय श्रृंखला में स्थित है और इसकी औसत ऊंचाई 1500 मीटर से 3000 मीटर के मध्य हैI

सिरमौर की सर्वोच्च चोटी, धारों की धार चूड़धार की ऊंचाई 11966 फिट है I इसके शिखर की तलहटी से बाह्य शिवालिक श्रेणी की कई शाखाएं निकलती है जिन्हें स्थानीय बोली में धारें कहा जाता हैं I इनमें धार टपरोली, नौहरा धार, दियोठी धार, निगाली धार, कमरऊ धार, जुईण धार, जामू धार, चांदपुर धार, रजाणा धार,संगड़ाह धार और दूधम धार शामिल हैं। सिरमौर में जमुना, टॉस, गिरि,जलाल,मारकंडा, सरस्वती, घग्गर आदि नदियां बहती है । इसके अतिरिक्त यहाँ अनेक बड़े खड्ड जिन्हें, नोएड़ो, नएट, भंगाल, सैंज, गाड़ आदि नामों से जाने जाते हैं, बहते हैं I वर्तमान में टोंस नदी उत्तराखंड तथा सैंज नदी शिमला के साथ प्राकृतिक सीमाओं का निर्धारण करती है I सिरमौर की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं में शीत ऋतु में बर्फ गिरती हैं और बिषम भौगोलिक क्षेत्र के कारण यहाँ के जन-जीवन में मैदानी जीवन शैली से पृथक सांस्कृतिक स्वरुप झलकता हैं I सम्पूर्ण गिरिपार सिरमौर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र है, पर्वतों की ढलानों और नदियों की घाटियों में अधिकतर जनसँख्या का घनत्व रहा है I

जलवायु एवं वनस्पति

जलवायु एवं वनस्पति: वर्षभर गिरिपार सिरमौर में चार ऋतुओं का मौसम रहता है जिसमें ग्रीष्म, वसंत, वर्षा और शरद शामिल हैं I यहाँ शीत ऋतु अक्टूबर से मार्च तक की लम्बी अवधि तक रहती है और तापमान शून्य से भी नीचे रहता है I ग्रीष्म ऋतु का अनुभव ज्यादातर कम ऊँचाई वाले भागों में ही होता है जिनकी समुद्र तल से ऊँचाई 900 मीटर से कम हैं I अधिकतर वर्षा वर्षा ऋतु में मानसून पवनों से प्राप्त होती है जबकि वर्षा का कुछ अंश शीत ऋतु में पछुआ पवनों के सक्रिय होने से हिमपात के रूप में मिलता है I फरबरी-मार्च में आने वाली अनियमित वर्षा को यहाँ कुम्बातरे कहते हैं I अधिकतम ऊंचाई वाले क्षेत्र में बान, बुरांश, देवदार, रोई, चिलरं आदि के वृक्ष पाए जाते हैंI मध्यम ऊँचाई वाले भाग में गुरियाल, क्यालु, बिउल, खडिक, कीमू, तूण, शिमल, भंडीर, भजौल और निन्म ऊँचाई वाले भाग में मालू, चीड़, शीशम, खैर, छानण, काम्बील, डेकाण, नौना, तिरमल आदि वृक्ष पाए जाते हैI प्रकृति की गोद में कई औषधीय वनस्पतियाँ भी उपलब्ध है जिन्हें लोक-उपचार में आदिम काल से प्रयोग किया जाता आ रहा हैI इनमें हरड, धंतुरा, नौना, आंवला, तुलसी, नीम, बैनकशा, तिम्बुर आदि प्रमुखता से स्थानीय लोगों द्वारा कई रोगों के उपचार के लिए इस्तेमाल किये जाते हैंIप्राकृतिक रूप से अपलब्ध कई वनस्पतियों को हाटियों द्वारा सहस्त्र शताब्दियों से साग, सब्जी, चटनी अचार के रूप में प्रयुक्त किया जाता हैं जैसे:-गुरयाल्टी, अमरीला, टिम्बुर, चुलूं, बाथू, बड़यालो, तिरमल, लिंगुड़ आदि I यहाँ पर सेब, आम, आडू, नाशपति, खुमानी, चुल्लू, पलम, पपीता, आरियेंटू, केला जैसे फलों की पैदावार अपने ही उपयोग के लिए की जाती हैं I तिरमल, खनेल्टू, किमोली, दुधेल्टू, फेगुड़ा, काफल, भुम्बल, सियांर, डोरेलटू, गोंदले, पीपेल्टू, बैदाणा, मकोड़े, छलीक, आछू, खड़ीक, चएतर, कश्मल, कुंईथ, जामुन आदि प्राकृतिक फलों का भी भरपूर आनन्द लेते हैं I

जनसँख्या विवरण

जनसँख्या विवरण: गिरिपार के मूल वाशिन्दें हाटी शिमला संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत सिरमौर जिले की चार विधान सभाओं में अपना प्रभावशाली अस्तित्व चिरकाल से बनाए हुए हैं I जिले के पांच विधान सभा निर्वाचन क्षेत्रों में से केवल शिलाई विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र सम्पूर्ण रूप से हाटी जनजाति क्षेत्र है I हाटी जनजाति की कुल जनसंख्या तीन लाख से अधिक है Iजिला कल्याण अधिकारी के जनसँख्या सर्वेक्षण रिपोर्ट 1998 के अनुसार गिरिपार की कुल जनसँख्या में खोश-कनैत-मियां-42.07%, भाट/ब्राह्मण/पाबुच-16.07%, देवा-2.29% और डेटि-2.03% हैं I जिला कल्याण विभाग के अनुसार वर्ष 2001 में गिरिपार क्षेत्र के मूल निवासियों का जातिगत जनसंख्या का प्रतिशत निम्न प्रकार हैं:

  • 1- खश कनैत 42.07%
  • 2- भाट ब्राह्मण,पाबूच 16.07%
  • 3- कोली 26.30%
  • 4- डूम 3.62%
  • 5- डेटी 2.03%
  • 6- देवा 2.29%
  • 7- बाड़ों(धीमान) 1.66%
  • 8- चमार 2.16%
  • 9- ढाकी 1.00%
  • 10- लोहार 1.21%
  • 11- बेड़ा 0.33%
  • 12- चनाल 0.85%
  • 13- तूरी 0.26%
  • 14- सुनार 0.20%
  • 15- अन्य 0.82%

आरम्भिक इतिहास

आरम्भिक इतिहास: गिरीपार सिरमौर खशों और खून्दों की भूमि हैं I रियासत सिरमौर की स्थापना से पूर्व महाभारत काल में भी यहाँ खशों तथा कुनिंदों की शासन प्रणाली विद्यमान थी I प्रचलित खश कानून एवं परम्परानुरूप ही यहाँ सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठ भूमि विकसित हुई है I महाभारत, बृहद सहिंता, अष्टाध्यायी तथा विष्णु पुराण में खशों और कुनिंदों के प्रसंग विद्यमान है I आरंभिक काल खण्ड में खशों की शासन व्यवस्था काशगढ़ से नेपाल तक र्फैली थी जो कालांतर में पूर्वी भारत की ओर प्रसारित होती रही I आर्यों की आरंभिक शाखा से सम्बंधित खश तथा कुनिंद उत्तराखण्ड के जौंसार बावर, सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र, शिमला की चौपाल तहसील और कुल्लू में बहुल संख्या में आबाद हैं I महाभारत में वर्णित है कि खशों ने कौरवों की ओर से कुरुक्षेत्र के युद्ध में भाग लिया था लेकिन कुछ खश विद्रोह करके पांडवों के पक्ष लड़े थे I इसका प्रमाण यहाँ की शाठा-पांशा परम्परा है जिसका निर्वहन आज भी होता है I अर्थात कौरवों के पक्ष से भाग लेने वाले खश शाठा कहलाए चूँकि वे 100 भाइयों की ओर से युद्ध में लड़े थे इसलिए शाठा शब्द साठ का नहीं बल्कि सौ का प्रतीक हैं जबकि कुछ खश पांच पांडवों के पक्ष से कुरुक्षेत्र में लड़े इसलिए उन्हें पांशा कहा गया I आज भी खशों और कनैतों की परम्परागत व्यवस्था दाईचारा-भाईचारा बहुत मजबूत सामाजिक इकाई के रूप में प्रचलित हैं जिसकी जड़ें जौंसार बावर और गिरिपार के खूंदों में स्पष्ट रूप से उपलब्ध है I

ईसा की प्रथम शताब्दी में रियासत सिरमौर की स्थापना होने के उपरान्त भी खशों और कुनिंदों के क्षेत्र स्वायत थे और इनकी अपनी व्यवस्था तथा सामाजिक-सांस्कृतिक व आर्थिक ताना-बाना चलता रहा I यह तो निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि किस काल खंड में जौंसार-बावर और गिरिपार क्षेत्र सिरमौर रियासत के भाग बने लेकिन यह पुष्ट साक्ष्यों के साथ कहा जा सकता है कि इन क्षेत्रों पर सिरमौर रियासत के शासकों का नियंत्रण नाम मात्र का था I इन खूंदों के अपने छोटे-छोटे क्षेत्र और हदें थी तथा एक-दुसरे पर प्रभाव स्थापित करने के लिए परस्पर पखों (प्रत्यक्ष रूप से लड़ने के लिए सामूहिक रूप से जाना) के माध्यम से लड़ाइयाँ करते रहते थे I सबसे महत्वपूर्ण व रोचक तथ्य यह है कि इनकी लड़ाइयों के दायरे इन क्षेत्र से बहार नहीं थे I शाठी केवल पांशी के क्षेत्र में और पांशी केवल शाठी के क्षेत्र में जोर आजमाईश करते थे जिनके उदाहरण 20वीं शताब्दी के आरम्भिक दो दशकों तक मिलते हैं I

गिरिपार सिरमौर के मूल निवासियों को हाटी कहते हैं जिसमें वर्तमान में 14 उप- जातियाँ सम्मिलित हैं यथा-खोश/खश/कनैत/मियां, भाट, देवा, डेटी, कोली, लुहार, बढ़ई, सुनार, डूम, चनाल, चमार, पाबूच, बोएड़ा आदि I इनका सदियों से परस्पर सौहार्द, समन्वयन और निर्भरता का सम्बन्ध रहा है I किसी भी जातीय संघर्ष का कोई प्रमाण नहीं मिलता है I खूंद और खशों के परस्पर संघर्ष के अलावा किसी भी अन्य जातियों के परस्पर संघर्ष नहीं रहे जो इस बात की पुष्टि करता है कि यहाँ का आरंभिक मूल निवासी खश ही था बाकी उप-जातियाँ बाद में आबाद हुई I

खशों और कनैतों के आबाद गाँव में या उनकी हदों में लगभग सभी जातियों के लोग रहते हैं I इनकी सुरक्षा का दायित्व खश-कनैत पर था और आवश्यकता पड़ने पर ये खश इनके लिए मर-मिटने को भी तैयार रहते थे I संक्षिप्त में कहें तो सामाजिक व्यवस्था का निर्वाहन और लोकाचार में यहाँ परस्पर जातीय निर्भरता प्रचलित रही जिससे श्रम विभाजन का स्वत: ही समाधान हुआ I भाट/पाबूच/ब्राह्मण को शिक्षा, देवपूजा, कर्मकांड और यजमान को मार्गदर्शन का कार्य सदियों से चलता रहा है जबकि समाज की अन्य जातियाँ पेशेवर श्रेणी के आधार पर आबाद हुई I काष्ठ कला, धातु कला, प्रस्तर कला, वाद्य कला, संगीत कला आदि के लिए विभिन्न पेशेवर जातियाँ यहाँ उपस्थित हैं I कृषि करने का प्रचलन यहाँ हर जाति व समुदाय में हैं I

खशो और खूंदों की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था पुरातन काल से थी I यद्यपि कुनिंदों में सिक्कों का प्रचलन था लेकिन स्थानीय लेन -देन वस्तु विनिमय के द्वारा ही होता रहा जिसका प्रचलन न्यूनाधिक रूप से आज भी विद्यमान है I 10वीं शताब्दी के बाद शिवालिक की उपत्यकाओं की तलहटियों में बाजारों के प्रचलन से गिरिपार के निवासी अपनी उपज और पैदवार को अपनी पीठ पर शईया, जगाधरी, चकराता, मंसूरी, चुड्पुर, कालसी, हरिपुर व्यास आदि स्थानों पर लगने वाले हाटों में ले जाते थे और वहां से वर्ष भर के लिए आवश्यक वस्तुएं जैसे कपड़ा, गुड़, शीरा, नमक आदि लेकर आते थे I

हाट के लिए सम्पूर्ण गाँव साथ जाता था जिसमें सभी जातियों के लोग सम्मिलित होते थे I हाट में जाने वाले दल को ही हाटी कहा गया और कालांतर में यही शब्द लोक प्रचलन में चलता रहा I यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि केवल हाट की परम्परा से इस समुदाय को जन जाति का दर्जा प्राप्त नहीं हुआ है बल्कि इसकी अपनी विशिष्ट संस्कृति है, सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन है और भौगोलिक पृथकता विद्यमान हैं I

गिरिपार के हाटी समुदाय की अनुसूचित जाति को छोड़कर खश/खोश /कनैत/ मियां/, भाट, देवा, डेटि, पाबूच को ही अनुसूचित जनजाति के रूप में अधिसूचित किया गया है क्योंकि अनुसूचित जाति के लोगों ने समय-समय पर स्वेच्छा से अपने को इस दायरे से बहार रखने की गुजारिश राज्य व केंद्र सरकार से की थी I

रियासत काल में सिरमौर के शासकों के बढ़ते प्रभाव व विस्तारवादी नीति के तहत सम्पूर्ण गिरिपार, जौंसार-बावर और रामपुर बुशहर तक के क्षेत्र को अपने अधीन किये गए तो स्वाभाविक है कि खशो और कनैतों को भी अपनी शक्ति बढ़ाने के अवसर सिमित हो गए I लेकिन इनकी सामजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्था में स्वायतता फिर भी बनी रही जिसमें शासकों की ओर से किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया गया I यहाँ का क्षेत्र गिरिपार बजीरी के रूप में गठित किया गया जिसका उद्देश्य मात्र राजस्व एकत्र करना थाI यद्यपि राज्य प्रशासन में गिरिपार के आंज-भोज से कई बजीर शासक की ओर से नियुक्त हुए और गिरिपार क्षेत्र राजगढ़ का देवथल व नेरी, आंज-भोज का राजपुर-कांगड़ा अल्प काल के लिए रियासत की राजधानियां भी रही I

कालसी तो मौर्य काल से पहले ही महवपूर्ण ऐतिहासिक स्थल था जहाँ महान मौर्य शासक अशोक ने 257 ई० पूर्व प्राकृत भाषा व ब्रह्मी लिपि में शिलालेख जारी करवाया था I यही कालसी 1000 वर्षों से भी अधिक समय तक सिरमौर रियासत की राजधानी रही थी I राहुल सांकृत्यायन का मत हैं कि कालसी से तिब्बत तक टौंस नदी के साथ-साथ व्यापरिक मार्ग से हाट के माध्यम से बड़ा व्यापार मौर्य काल से पूर्व भी होता था जिसमें पीठ पर माल लादकर एक स्थान से दुसरे स्थान तक पंहुचाया जाता था I आज भी हाटियों को हाट में जाने के पैदल मार्ग अच्छी तरह ज्ञात है जिसमें सप्ताह भर मीलों चलकर हाट या बाजार तक पंहुचा जाता था I गिरीपार सिरमौर के साथ-साथ जौंसार बाबर का क्षेत्र भी वर्ष 1815 तक सिरमौर रियासत का अभिन्न अंग थाI गौरखों को पराजित करने के बाद हुई सगौली की संधि से अंग्रेजी कम्पनी ने जौंसार बावर का क्षेत्र अपने अधीन किया था I

जौंसार बावर से घनिष्ठता

जौंसार बावर से घनिष्ठता:जौंसार बाबर और गिरीपार सिरमौर में भौगोलिक, सामाजिक-आर्थिक एवं सांस्कृतिक समरूपता हैI दोनों क्षेत्र दो अलग राज्यों में स्थित होने के वाबजूद आज भी विशिष्ट एवं अदिम परम्पराओं को संरक्षित एवं सुरक्षित रखे हुए हैंI दोनों इलाकों में मेले त्यौहार, सामाजिक, आर्थिक एवं जनाकंकीय संरचना एक सामान हैI जातीय व्यवस्था, स्थानीय न्याय प्रणाली, लोक परम्पराएँ एवं मान्यताएं समतुल्य हैI दोनों ही क्षेत्रों के लोगों में आज भी बेटी-रोटी का संबंध हैI दोनों क्षेत्र के अधिकतर गाँवों का परस्पर दाईचारा-भाईचारा आरम्भिक काल से ही विद्यमान रहा हैI जौंसार-बाबर और गिरीपार सिरमौर में अगर कुछ अंतर है तो वो है टोंस नदी द्वारा प्राकृतिक विभाजनI

वर्ष 1967 ई० में भारत सरकार द्वारा जौंसार बाबर के निवासी जौंसारा को जनजाति घोषित किया जिससे गिरिपार क्षेत्र के हाटियों को अपना अधिकार प्राप्त करने को प्रोत्साहन मिला और पांच दशकों से भी ज्यादा समय तक लम्बा शांतिपूर्ण संघर्ष करना पड़ा I एक और सार्थक एवं अति महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख करना अत्यंत आवश्क हो जाता है जब हम जौंसरा और हाटियों के एकरूपता की बात करते हैंI 1815 ई० में जौंसार-बाबर का अंग्रेजी हकुमत के अधीन आने से तत्कालीन अंग्रेजी विद्वानों ने यहाँ की विशिष्ट संस्कृति एवं सामाजिक–आर्थिक गतिविधियों को दस्तूर-उल-अमल तथा वाजिद-उल-अर्ज के रूप में संकलित करके उजागर कियाI कालांतर में अंग्रेजी विद्वानों का यही संकलन इस क्षेत्र के जनजातीय घोषित होने में प्रमाणिक दस्तावेज बना जबकि गिरीपार सिरमौर का कोई प्रमाणिक अन्वेषण, शोध एवं साहित्य लेखन नहीं हुआ जिसकी वज़ह से इस क्षेत्र के हाटी समुदाय को दशकों लंबित पड़े संवैधानिक अधिकार को प्राप्त करने के लिए निरंतर कड़ा संघर्ष झेलना पड़ा I

समृद्ध खाद्य परम्परा

समृद्ध खाद्य परम्परा: विकट भौगोलिक स्वरुप ने ही गिरीपार क्षेत्र के लोगों के व्यंजन और पकवान भी अलग तरह से प्रभावित किये हैंI आज भी 90% जनसंख्या मासाहारी हैI शीत लहर से बचाव हेतु हर घर में खाद्य योग्य पशु पाले जाते हैं और सर्दी के मौसम प्रारंभ होते ही मांस के उद्देश्य के लिए काटे जाते हैI भेड़, बकरी, सुअंर आदि पशु पालन मांस उद्देश्य के अतिरिक्त ऊंन के लाभ के लिए भी लोग रखते हैंI क्योंकि आदिम काल में इनके ऊँन से कम्बल, ढाबली, दुअड़, लोइया, सुथण, खारचा, कोट, आदि स्वंय बनाते आ रहे हैंI

गिरिपार क्षेत्र में व्यंजन और पकवान भी मौसम के आधार पर ही बनाये और खाए जाते हैंI सर्दी में मुड़ा, खेंडा, खुबलू, सिडकु, उलोउले, शाकोली, कुकवा, खीर, पटांडा, ध्रुटी-भात, चिलड़े, लिम्बड़ों, छांईछो आदि पकाए और खाए जाते हैं क्योंकि ये अधिक गर्म तासीरके पकवान होते हैं ताकि शरीर को अधिक देर तक उर्जा प्राप्त हो सकेंI घी का सेवन हर पकवान के साथ होता हैI चूँकि वर्ष भर मौसम ठंडा ही रहता है इसलिए अधिक उर्जावान पकवान भी वर्ष भर पकाए और खाए जाते हैंI

गिरीपार सिरमौर की बिषम भौगोलिक बनावट के कारण ही यंहा की खाद्य फसलों की पैदावार भी वैशिष्टिय हैI बारीक अनाज आदिम काल से ही लोगों के सेवन का मुख्य बिंदु रहा हैI क्योंकि यह अनाज अधिक पौष्टिक होने के साथ-साथ कई वर्षों और पीढ़ियों तक भंडारित किया जा सकता है और आवश्कता पड़ने पर उपयोग में लाया जाता रहा हैI कोदा, कावणे, चीणए, शांवक, चौलाए आदि ऐसे बारीक अनाज है जो पीढ़ियों तक भी सुरक्षित रखे जा सकते हैंI इनके अतिरिक्त मक्की, धान, अदरक, लाल मिर्च, भंग्जीरा, भांग, माश, भअट, कालाजीरा की भी पैदावार की जाती हैI पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण गेंहू की पैदवार काफी कम होती हैI

भातियोज, दियाली, मशराली, हरियाली, गुगाल, पान्जवी, खोड़ा, पाएतो, जागरा, बिशु आदि पर्वों व मेलों में कई तरह के पकवान बनाएं जाते हैं और महमानों तथा परिवार जनों को घी के साथ परोसे जाते हैं I खाद्य अन्नाजों को लम्बे समय तक भण्डारण के लिए कुठार, बाड़े, डोबली, कुठारी, कोछू, तीरा आदि का प्रयोग किया जाता है I सूखे अनाज को घराट तक ले जाने में बकरे या खाडू की खाल से बना खल्टू, घौटाला, कोटाला आदि उपयोग में लाया जाता है I मीट को धुएँ में सुखाकर निगाल के बने डाल में तथा मछली को उम्टारी में रखने का प्रचलन हैं I घी को कुनड़ी, बाटुआ, सैर आदि में भंडारित किया जाता है I

लोक संस्कृति

लोक संस्कृति: हाटियों के लोक गीत, नृत्य, वाद्य, मेले , त्यौहार, परम्पराएँ, मान्यताएं, सम्पति का बंटवारा, विवाह परम्पराएँ, खाद्य शैली, भेष- भूषा, आभूषण-श्रृंगार, जन्म-मृतक संस्कार, देव मान्यताएं, धार्मिक आस्था आदि विशिष्ट एवं मौलिक हैI गिरिपार सिरमौर में बहु पति प्रथा आदि काल से विद्यमान रही हैं और यह आर्थिक बिषमता के कारण अपनायी जाने वाली परम्परा मात्र नहीं हैं इसकी जड़ें महाभारत कालीन पांच पांडवों का द्रोपदी से हुआ विवाह के मूल में देखने की आवश्यकता भी है जिसका अनुसरण आज भी न्यूनाधिक रूप में विद्यमान है I लोक वाचाल में बहु पति प्रथा को पाण्डव प्रथा या जोडीदारा के नाम से पुकारते हैं I

यहाँ हर परिवार का गृह देवता, कुल का कुल देवता/देवी, गाँव का ग्राम देवता, ख़त का ख़त देवता और क्षेत्र का क्षेत्र देवता रक्षक, न्याय और सामाजिक समन्वयन का माध्यम है I गूर के रूप में देवता साक्षात् प्रकट होता है और अपनी प्रजा से वार्तालाप करता है I लोगों के सुख-दुःख में सम्मिलित होता है I यहाँ नाग, रेणुका, काली, परशुराम, गुगा जी, शिरगूल, भांगायणी बिजाई, महासू, ठारी, गुडयाली, कुलाणा, भैरव, चार वीर, कोईलू आदि देव-देवियाँ व वीर आदि के रूप में पूजे जाते हैं I

यहाँ के लोक साहित्य में हाटी लोक गाथाएँ, कथाएँ, गीत, हारुल, लामण, झूरी, झान्गु, भाभे, गांगे, पवाड़े, छम्कुटे आदि लोकप्रिय है I नृत्य में रासा, गी, तांद, बैठेअ, नाटे, डांगरा, तलवार, हाथी, हरीण, बुढा सिंह, सिहन्टू, ठोड़ा, होजुरा, लिम्बर, हार्शो आदि प्रसिद्द हैं I

लुगड़ी, घाघरा, कुर्ती, धान्टू, गाचे महिलाओं का पहनावा है और झागा, सुथण, टोपे, लोइया पुरुष पहनावा हैं I महिलाएं नाथ, उत्तराली, टीका, गैरा, मुदडी, मुरकी, बाजूबंद, हान्सुली, हार, तुंगल, तिले, फोले, लुड़कू, छल्बले, अंगूठी तथा पुरुष नोती, अंगूठी आदि सोने चाँदी के गहने पहनते हैं I

सम्पति के बंटवारे में जैठोंग, कंछोंग, काश्टोंग, जीउगा आदि हिस्सों का प्रचलन हैं I परिवार की सहमति से ही जमीन जायदाद का बंटवारा होता है और गाँव के एक या दो मौजीज आदमी बटवारे के समय उपस्थित रहते हैं ताकि भविष्य में किसी प्रकार के कलह से बचा जा सकें I खुमली न्याय वयवस्था का सस्ता माध्यम हैं और अधिकतर मामलों में कोर्ट कचहरी जाने से हाटी बचते हैं I बेड़ा या आल ग्रामीण व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार माना जा सकता है I ख़त की खुमली भी यदा कदा बड़े निर्णय के लिए बुलाई जाती है जब होने वाले निर्णय से बड़ी जनसँख्या प्रभावित होती हो I देवता की न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है I

यहाँ पापड़ा, जीन्गार, भाख, दोष, लाठो, गणाद, बीष जैसी मान्यताएं आज भी प्रचलित हैं जिनका निवारण भाट, ब्राह्मण या पाबूच, भुजरौठी, माली, गणचारा, उतारीक, ठाणी के द्वारा अपेक्षित हैं I बकरा धूणोणा, चुल्लू पाणा, लाठे थोणा, बांदो, आखर, झूठ आदि देवता के नाम पर रखा जाता है जिससे संकट का तुरंत निवारण अपेक्षित रहता है I

हाटियों में झाजड़ा, खिताएअ, हार आदि विवाह आज भी प्रचलित हैं लेकिन अब बाल विवाह का प्रचलन नहीं है लेकिन जोड़ीदार आज भी अपनाया जाता है जिसमें दो भाइयों की एक ही महिला से शादी होती हैं और हाटी समाज में इसे सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है I

हाटियों के आवास स्थल किसी देवालय के समान ही होते हैं जो देवदार की लकड़ी से निर्मित किये जाते हैं जो भूकम्प रोधी तो हैं ही साथ ही कला व वैज्ञानिक सोंच का अनूठा प्रदर्शन हैं I काष्ठ-कुणी शैली में निर्मित भवन दो या तीन मंजिलें होते हैं जिसमें सबसे नीचे वाले मंजिल पालतू पशुओं के लिए बनाई जाती हैं और इसमें अधिकतर पत्थर का उपयोग किया जाता है I पत्थरों की चिनाई को मजबूती देने के लिए तीन फुट के अंतराल पर लकड़ी के मोटे स्लीपरों से दोनों तरफ कसा जाता है ताकि भूकंप की स्थिति में पत्थर आगे पीछे न खिसक सकें I

ढलवां छतें स्लेट से ढकी जाती हैं और छत के मध्य भाग में गोल पत्थर रखा जाता है जिसे क्षेत्रपाल कहा जाता है I घर के अन्दर जूतों सहित प्रवेश वर्जित है और घर में गृह प्रवेश के समय कुल देवता का आतिथ्य आवश्यक माना जाता है I जिस घर में देवता का प्रवेश रहता है उसे हार्शो घर कहते हैं I

हाटी जन आन्दोलन

हाटी जन आन्दोलन: 1970 ई० के दशक में गिरीपार सिरमौर के हाटियों ने अपना हक प्राप्त करने के लिए हाटी समिति का गठन करके इसका पंजीकरण करवायाI तत्कालीन सरकार और उत्तरोतर सरकार के समक्ष अपनी जायज़ मांग रखी और सरकार की तरफ से विभिन्न समितियां गठित भी की गयी, प्रदेश विश्वविद्यालय के जनजातीय विभाग द्वारा विस्तृत रिपोर्ट भी तैयार करवाई गयीI भारत सरकार के जनजातीय मंत्रालय तथा प्रदेश सरकार के जनजातीय विभाग के कई कार्यालयी आदेश पारित होते रहेI भारत के महा पंजीयक के दौरे भी हुए परन्तु दशकों से लंबित पड़ी मांग को पूरा होने की दिशा में कोई सार्थक परिणाम नजर नहीं आयाI

1970 के दशक से आरम्भ हुआ शांतिपूर्ण हाटी जनजाति आन्दोलन अपने सफ़र में कई उत्तार चढ़ाव को पार करता हुआ 4 अगस्त, 2023 को केन्द्रीय विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति उपरान्त सफलता के परवान चढ़ा हैंI

पाठकों की जिज्ञासा हेतु यहाँ यह उल्लेख करना परम आवश्यक है कि गिरीपार सिरमौर आदिकाल से अद्भुत एवं समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का पालना हैI आदिम एवं विशिष्ट परमपराओं को अपनी आगोश में समेटे हुए हैI यह क्षेत्र आदिम जातियों, विलुप्त प्राय व्यवसायों, अनूठी लोक परम्पराओं एवं अलग सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों के लिए अपनी अलग पहचान रखता हैI आधुनिकता के छद्म एवं क्षणिक प्रभावों के इस दौर में इस अमूल्य धरोहर को बचाना अत्यंत आवश्यक हैI जिस हेतु आज इस क्षेत्र के निवासी जनजातीय दर्ज़ा प्राप्त करने के लिए संघर्षरत है ताकि अपनी समृद्ध एवं अलग पहचान को संरक्षित एवं सुरक्षित करके वैश्विक पटल पर उभारा जा सकेI इस क्षेत्र के युवा यदपि अपनी मौलिक संस्कृति में आज गौरवान्वित महसूस करते है लेकिन वैश्विक पटल पर इस की मान्यता सरकार की जनजातीय घोषणा से पुष्ट हो गयी है I

गिरीपार सिरमौर के हाटियों को जनजाति का अधिकार प्राप्त होने में सहस्त्र लोगों की उर्जा और संसाधन की आहुति डली हैं I कई वुद्धिजनों ने हाटी जन संघर्ष का हर पहलू स्वाभाविक रूप से आत्मसात किया है और अपने भावनात्मक जुड़ाव से वास्तविकता को सहजता एवं सरलता से हर मंच पर प्रस्तुत करने में सहयोग दिया हैI हाटी समिति की संस्थापक कार्यकारणी से लेकर वर्तमान कार्यकारणी, ब्लॉक व तहसील इकाइयों तथा क्षेत्रीय इकाइयों ने निरंतर छह दशकों के लम्बे संघर्ष में जिस धैर्य व शांति के साथ सहयोग दिया है वह अत्यंत सराहनीय हैं I कई लेखकों, पत्रकारों, शोधार्थियों, फिल्मकारों, ने वर्षों से केंद्र सरकार और राज्य सरकार से हुए सभी पत्राचार को बड़ी बारीकी से पढ़ा एवं परखा हैI विभिन्न अध्ययन रिपोर्टों, कार्यालयी आदेशों एवं प्रतिउत्तरों के अतिरिक्त कई लेखकों के किये गए प्रयासों की भी हाटी जन हृदय से कृतज्ञता प्रकट करते हैं I

गिरीपार सिरमौर की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण करना हमारा परम दायित्त्व हैI इस सांस्कृतिक विरासत को अपेक्षित परिवर्तनों के साथ भावी पीढ़ी को सौंपना भी हमारा ही कर्तब्य हैI इस लिए उन अनुभवों एवं परिपाटियों को कलमबद्ध करना उचित होगा जिनसे भविष्य की पीढ़ी इस विलग एवं विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक व सांस्कृतिक विरासत को ग्रहण करने में न केवल गौरवान्वित महसूस करे बल्कि आत्मसात करके पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाएं और वैश्विक पटल पर उभारेंI

यहाँ यह उल्लेखित करना सर्वथा उचित होगा कि जिज्ञासु व ज्ञान पिपासु शोधार्थियों द्वारा हाटी संस्कृति पर बहुआयामी शोध प्रकशित होने से गिरीपार सिरमौर की मौलिक एवं वास्तविक पहचान को पाठको के समक्ष लाया जा सकेगा जिस उद्देश्य से केंद्र व राज्य सरकार ने यह अनुसूचित जनजाति का अधिकार प्रादन किया है I हाटियों की विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर एक अमूल्य निधि के रूप में भावी पीढ़ी को विरासत में प्राप्त होंगी ताकि वे अपनी पहचान की जड़ों को सिंचित कर मजबूत कर सकेंI

!! जय हाटी, जय माटी !!

Hatti Area Map

गिरि नदी द्वारा सिरमौर का प्राकृतिक विभाजन: गिरिआर व गिरिपार