आर्थिक संसाधन
i) आर्थिक संसाधन- ग्रामीण पृष्ठ भूमी पर बसे हाटी के आर्थिक संसाधन अत्यंत सीमित और बहुपियोगी हैं I कृषी ग्राम अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और अपनी जरूरतों के ९०% संसाधन खेती और पशु पालन से पूरे होते हैं I ९०% मकान आज भी लकड़ी और पत्थर से बने हैं जिसके लिए इमारती लकड़ी साथ लगते जंगल से इमारती लकड़ी वितरण अधिनियम के तहत प्र्रप्त होती है और पत्थर माकूल मात्रा में हर जगह उपलब्ध है I खाद्य अनाजों की खरीद की आवश्यकता नहीं रहती हैं क्योंकि प्रचुर मात्रा में किसान अपने खेतों में उगा लेते हैं I कृषि में नकदी फसलें जैसे-अदरक, लाल मिर्च, कलिजीरी, आदि बीजते हैं और वेर्ष भर के लिए अपने गुजारे-भत्ते के लिए आमदनी प्राप्त करते हैं I कई घरों के पास मक्की, गेंहू, चौलाई आदि फसले भी अपनी आवश्यकता से अधिक होती हैं जिन्हें बेच कर आय प्राप्त करते हैं I
वर्तमान में टमाटर, गौभी, आलू, कचालू, बीन, शिमला मिर्च, मटर आदि हरी सब्जियों से भी किसान अच्छी आय प्राप्त कर रहे हैं और अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं I ऊँचाई वाले क्षेत्र जैसे भागनाड़ी, घाला में सेब के बगीचे भी तैयार किये जा रहे हैं लेकिन अभी ये बहुत आरम्भिक अवस्था में है और इसमें चुनिदा किसान ही हाथ आजमा रहे हैं I इस गाँव की अर्थव्यस्था में दूसरा महत्वपूर्ण अवयव हैं पशु पालन जो कृषि के पश्चात किसानों की अर्थव्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता हैं I
सम्पूर्ण कृषि कार्य पशुओं पर आधारित हैं चाहे खेत में हल लगाने का काम हो या फिर खेतों के लिए गोबर खाद की व्यवस्था हो या फिर भार ढोने के लिए प्रयों में लाये जाने वाले पशु हों या फिर मीट और मास प्राप्त करने या फिर दूध, घी, लस्सी आदि प्राप्त करना हो, सब पालतू पशुओं से ही प्राप्त किया जाता हैं I किसान इन पालतू पशुओं से अतिरिक्त उत्पाद तैयार कर जैसे घी आदि बेचकर घर की आधी जरूरतें पूरी करते हैं I कई किसान पशुओं का विक्रय करके अच्छी खासी रकम साल भर इकठ्ठा करने में सफल होते हैं जिसमें विशेष कर बकरियां और भेड़े और माघी के त्यौहार के लिए बकरों को पालकर बेचा जाता हैं I
एक और कटु सत्य यह भी है कि आज की बढती चकाचौंध वाली दुनिया और बाज़ार ने इस गाँव के किसानों को भी ललायित किया हैं और खेती तथा पशु धन से पुरे वर्ष भर का व्यय पूरा होना सम्भव नहीं होता है इसलिए आज भी गाँव के लगभग हर घर से लोग दिहाड़ी, मजदूरी करने के लिए शिमला, सोलन, चकराता, जुब्बल, नाहन, पांवटा, रोहडू और मंसूरी जाते हैं I आय बढाने के उद्देश्य से लोगों ने बेमैसमी सब्जियां और नकदी फसलों का उत्पादन प्रारम्भ तो किया है लेकिन सिंचाई की उपयुक्त व्यवस्था न होने से इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता हैं I सरकारी नौकरी पेशे में हाटियों की प्रतिशतता बहुतकम है जो कुछ लोग हैं वो या तो सामान्य सैनिक, लोक निर्माण विभाग में बेलदार, अन्य विभागों में सेवादार, चौकीदार, टी० जी० टी०, जेबीटी, प्राध्यापक व आचार्य आदि तक सीमित है I
कृषि एवं पारंपरिक पद्धतियां
i) कृषि- ९८% लोगो का प्रमुख व्यवसाय केवल कृषि है और वो भी परम्परागत मानसून आधारित कृषि I गाँव का किसान सीढ़ीनुमा खेत में बैल की जोड़ी और अपने बनाई हुए लकड़ी के हल से परम्परागत खेती करता हैं यहाँ न तो टिलर और नहीं ट्रेक्टर का प्रचलन है I गेहूं से भूसा अलग करने के लिए गेहूं को खलियान जिसे “खला” कहते हैं, में मूठ को काटकर पहले सुखाया जाता है और फिर बैल को खलिहान के मध्य निश्चित की गई धूरी जिसे ‘धोरा’ कहते हैं, में ढीली रस्सी बांधकर हर बैल के गर्दन से बांधी जाती हैं और सारे बैल एक साथ वृताकार घुमाएं जाते हैं इसे “दाऊँड” कहते हैं I
लगभग तीन या चार घंटे तक कटी गेंहूं की सुखी फसल पर बैल को घुमाने के बाद गेहूं भूसे से अलग हो जाते है और बाद में उन्हें हवा की सहायता से “शुपे” का प्रयोग करके भूसा अलग किया जाता हैं और गेहूं एक ढेर के रूप में एकत्र होते हैं I लेकिन गेंहू से भूसा अलग करने के लिए अब हर गाँव में एक-एक थ्रेशर जरूर उपलब्ध हैं I गाँव में फसलों की सिंचाई हेतु कुहल का प्रयोग होता है लेकिन ये केवल देवनल या फिर ठेलेणु में ही उपलब्ध है बाकी जगह केवल मानसून आधारित कृषि ही होती है I
कुछ खाले के साथ लगते भागों में धान की खेती क्यारों में की जाती है जैसे-क्यारी खाले में परसेट, नाईलुआ, तिलकाण, बुडाईक, डेटी के क्यार आदि जहाँ माकूल पानी है और क्यार में धान रोपणे से लेकर पकने तक पानी की उपलब्धता रहती है I धान को पकाने के बाद तिरछे रखे बड़े सपाट पत्थर पर पटक कर झाड़ा जाता हैं और फिर “कुटटाली या घटाली” में भरा जाता हैं I
लकड़ी का हल, शमाई, गाण, नासे, फाला, गुन्ने, कोशले, मोईडा, बास, जुतरो, छाबो, दाओं, नियाण, छेणा, आदि कृषि कार्य में उपयोग होने वाले औजार है जिनका प्रबंध हर घर में खुद किया जाता है I कृषि कार्य में सभी जातियों और समुदायों के लोग संलग्न हैं I
फसलें एवं दाना अलग करने की पारंपरिक विधियाँ
| क्र० सं० | पकी फसल का नाम | भूसे से दाना अलग करने की विधि |
|---|---|---|
| १ | मक्की | खोलय (हाथ से दाना अलग करना) |
| २ | गेहूं | गायअ (बैल की सहायता से खलिहान में) |
| ३ | धान | झाडेअ (सपाट पत्थर पर झाड कर) |
| ४ | कोदा | गायअ (बैल की सहायता से खलिहान में) |
| ५ | चौलाए | गायअ (बैल की सहायता से खलिहान में) |
| ७ | कावाणे | मांडेअ (एक सप्ताह ढेरी में रख कर फिर पाँव से मसल कर) |
| ८ | चिणोए | मांडेअ (एक सप्ताह ढेरी में रख कर फिर पाँव से मसल कर) |
| ९ | शांवक | मांडेअ (एक सप्ताह ढेरी में रख कर फिर पाँव से मसल कर) |
| १० | भोट | गायअ, पीटीअ (बैल की सहायता से खलिहान में या फिर डंडे से पीटकर) |
| ११ | माश | गायअ, पीटीअ (बैल की सहायता से खलिहान में या फिर डंडे से पीटकर) |
| १२ | मसूर | पीटीअ (डंडे से पीटकर) |
| १३ | कुल्थी | गायअ, पीटीअ (बैल की सहायता से खलिहान में या फिर डंडे से पीटकर) |
| १४ | लोबिया | खोलय (हाथ से दाना अलग करना) |
| १५ | बीन | खोलय (हाथ से दाना अलग करना) |
| १६ | तिल | झाडेअ (घीले की नीचे चादर बिछाकर तिल की पकी हुई डंडिया झाड़ी जाती हैं) |
भूमि स्वामित्व एवं राजस्व व्यवस्था
i) भूमि स्वामित्व- किसान खुद अपनी भूमी का स्वामी हैं और उसके पास भूमी संबंधी सारे अधिकार सुरक्षित हैं अर्थात वह भूमी को बेच सकता हैं और खरीद सकता हैं लेकिन कृषि भूमी को केवल कृषि उपयोग के लिए राज्य के लोगों को ही बेची जा सकती हैं बाहरी राज्यों के लोग नहीं खरीद सकते हैं I भूमी को किस्म के आधार पर विभाजित किया गया है जैसे- अब्बल, दोएम, दोएम अब्बल, ओबड़, बंजर, बंजर कादीम आदि I
अब्बल भूमी वो भूमी हैं जिसमें कूहल आदि लगती हैं और इस प्रकार की भूमी से सरकार आज भी मालगुजारी वसूलती हैं I श्री गुलाब सिह मत्याण का परिवार आज भी १२०रू प्रति छह माह मालगुजारी प्रदान करता हैं I श्री दलीप सिंह बिकाण का परिवार आज भी १५० रू० प्रति छह माह मालगुजारी प्रदान करते है I जोतों का आकार अत्यंत छोटा हैं और केवल बैल की जोडी ही सीढ़ीनुमा खेतों को जोतने के लिए उपयोग की जाती हैं I विरला खेत ही एक बीघा से अधिक होता हैं ज्यादातर खेत ५ विश्वा से ८ विश्वा के मध्य हैं I
अनुसूचित जनजाति के भूमिहीनों के लिए भी सरकार द्वारा पाँच विघा जमीन मुफ्त प्रदान की गयी हैं जिसका उपयोग ये भूमिहीन किसान केवल अपने लिए कर सकते हैं इस भूमी को बेचा नहीं जा सकता और न ही खरीदा जा सकता हैं I सरकार ने भूमिहीनों के लिए मकान बनाने के लिए भी मुफ्त तीन विश्वा भूमी प्रदान की हैं जिस पर वे अपने मकान बना सके I
स्वामित्व वाली कृषी भूमी के अतिरिक्त गाँव के पास शामलात भूमी भी उपलब्ध हैं जिसमें पशु चरागाह, घासिण आदि हैं I शामलात भूमी पर लोगों ने अपने कब्जे स्थापित किए हैं जिसका राजस्व विभाग के द्वारा चकबंदी के समय वितरण किया है और अब केवल पशु चारागाह वाले क्षेत्र ही शामलात में पड़ते हैं I इस गाँव की सम्पूर्ण क्षेत्र का ४०% भाग वन भाग के अंतर्गत आता हैं लेकिन वनाच्छादित क्षेत्र केवल १०% ही हैं जिस पर देवदार के आरक्षित वन हैं I झकांडो, भटोडी, नाला, कुने, क्कोली, देवनल आदि उप गाँव में वन विभाग का अधिक भाग हैं I
पशुपालन एवं प्रबंधन
i) पशुपालन- इस गाँव में पशुपालन किसान केवल कृषि कार्य और अपने सीमित उपयोग हेतु ही करता हैं I हर घर में घरेलू नस्ल की दो-तीन छोटी गाय पालने का प्रचलन है क्योंकि पहाड़ी और चट्टानी क्षेत्र होने से यहाँ प्रचुर मात्रा में चारे का अभाव रहता है और खुले चारागाह भी उपलब्ध नहीं हैं I खेतो में हल चलाने के उद्देश्य से घरेलु नस्ल की बैल की एक जोड़ी हर किसान परिवार के घर पाली जाती है लेकिन बड़े किसानो के घरों में दो या तीन जोड़ी बैल भी पाले जाते हैं I
गाय के लिए चारे का प्रबंध करना महिलाओं का काम माना जाता हैं और दूध निकालना, दही, लस्सी, मक्खन, घी, बनाने का काम अधिकतर महिलाएं ही करती हैं I गाय के गोबर को “ओबरे” से बहार निकाल कर एक ढेर में एकत्र किया जाता हैं जिसे “गोबराश” कहते हैं, और बाद में ये गोबर केंचुआ खाद में तब्दील होकर खेतों में घीले, शेकुडी, शेकोड़ो और धावनी के माध्यम से ढोया जाता है I
इसके अतिरिक्त बकरियां, भेड़े भी पालते हैं लेकिन ये कार्य केवल चुनिन्दा परिवार ही करते हैं क्योंकि इसके लिए अधिक आदमियों और खुले चरागाहों की जरूरत है जो कि इस गाँव में काफी कम हैं I ये लोग बरसात के मौसम में इन्हें जौनसार के “ओथियो” या फिर धम्बराऊ के जंगल में चुगाने ले जाते हैं जिसके एवज में १२०/रू० प्रति बकरी या एक बकरा देते हैं जिसे “बुणकरा” कहते हैं I बैल के लिए ये दर १५०/रू प्रति बैल प्रति तीन माह वसूला जाता हैं I बकरियां और भेड़े पालने से माँघ के महीने में त्यौहार के लिए बकरा या मेढ़ा भी प्राप्त होता है I
चारा एवं आहार व्यवस्था: चारे के रूप में घास, भूसा, गैहोवान, कुक्डान, ओलाए आदि खिलाया जाता हैं I बूढी दियाली की भिऊरी के दिन के बाद १५ गेट फाल्गुन तक पशु दिन भर धूप में बांधे जाते है जिसे “थाची” कहते हैं I दुधारू पशुओं के लिए अलग से दाना दिया जाता है जिसे लाम्बड और दालो कहते हैं I भातियोज़ त्यौहार के लिए पाले जाने वाले बकरे या खाडू के लिए दिया जाने वाला अनाज “कुडका” और पीसे आटे का कच्चा गोला “पीन” कहा जाता हैं और बाड़े में ही इन्हें अलग से साल भर पाला जाता है I
ग्राम उद्योग एवं पारंपरिक शिल्प
i) ग्राम उद्योग- (कताई, बुनाई, लोह-औजार, आभूषण-निर्माण, काष्ठ-उपकरण इत्यादि): कृषि के अतिरिक्त बुनकर, बढ़ई, मिस्त्री, लुहार, दर्जी, नाई, दस्तकार जैसे व्यवसाय का भी प्रचलन इस रहा है I यदपि इन व्यवसायों से ग्रामीण समाज में केवल जीवन निर्वाह हेतु आय प्राप्ति होती है और वो भी वस्तु विनिमय के रूप में I दस्तकारों द्वारा बांस, तुंअग और निगाल का उपयोग कर सुन्दर घीलें, शेकडी, डाला, शेकडो, छोईलो, शुपो, धावने आदि बनाये जाते हैं जिसमे डूम समुदाय को दक्षता प्राप्त है I देवनल के डूम पूरे गाँव के लिए उपरोक्त वस्तुएं बनाते हैं और इसके एवज में हर घर से “बुणाई” अनाज के रूप में प्रदान की जाती है I
धातु में तिलियाने, चाल्णों, कुद्वाने, शुपो आदि भी निर्मित किये जाते हैं जिसका निर्माण ठठेरे या कशेरे द्वारा किया जाता है I बढ़ई द्वारा हान्ड़ो, चरखी, नासी, हल, शमाई, गाण, मोईड़ा आदि बनाए जाते हैं I बढ़ई का काम या तो कलयाण परिवार करता है या फिर धारवा में अलग बढ़ई के काम करने वाले बढ़ई समुदाय के दो-तीन घर हैं जो लकड़ी के मकान बनाने के काम में दक्ष हैं I वाद्य यंत्रों में मढ़ाई का काम खुद ढाकी समुदाय करता हैं इसके लिए बकरे की खाल का इस्तेमाल किया जाता हैं I ढोल, दुमानो, खंजरी आदि मढे जाते है और इनका मेहनताना हर घर से अनाज के रूप में फसल आने के समय दिया जाता हैं I
गाँव का ढाकी ही नाई का काम भी करता है और हर संक्रान्ति के दिन घर-घर जा कर बूढ़े, बुजुर्गों की हजामत करता है I इसके बदले में उसे आटे का “सोला” प्रदान किया जाता हैं यदपि अब ये प्रचलन कम हुआ है क्योंकि अब हर घर में लोग खुद शेविंग का सामान रखते हैं I मिस्त्री पत्थर के काम में दक्ष माने जाते है और कोली समाज से ज्यादा लोग मिस्त्री का काम करते हैं I दीवार का काम या फिर मकान में पत्थर का काम गाँव समाज में ये लोग ही करते है और इसके बदले अनाज नहीं बल्कि दिहाड़ी-मजदूरी दी जाती हैं I घरों के ढलवां छतों पर स्लेट की छत डालना या फिर उसकी मुरम्मत करना भी मिस्त्री का ही काम होता हैं I
हर घर में ऊन की तक्क्ली और छोईलो रखा होता है और पुरुष शाम के समय ऊन कातते है I वारिश के मौसम के समय हर घर में शैल की “पागोई” और “दाँव” बनाये जाते हैं I कृषि उपकरण हेतु लोहार से दराती, दात, पचियाड़ो, कातला, चाक़ू, चिमटा, धौन्टू, दाच्टू, फाला, कुराड़े, वर्ष भर के लिए बनवाए जाते हैं चूँकि इस गाँव में लुहार नहीं रहते हैं इसलिए सांगना-स्तान, राउर, नैनिधार से लोहार बुलाकर सभी गाँव के लोग एक जगह सुनिश्चित कर कृषि औजार और घरेलु हथियार बनवाते हैं जिसके एवज़ में अनाज प्रदान किया जाता है जिसे “खलीक” कहते हैं I अर्थात वस्तु का विनिमयकरण ग्रामीण समाज का अभिन्न अंग आज भी विद्यमान हैं I
फसलें एवं कृषि चक्र
i) फसलों का वर्गीकरण- इस गाँव में फसलों का वर्गीकरण छह प्रकार से किया जा सकता हैं- मोटे अनाज, बारीक अनाज, दलहन, तिलहन, नकदी और सब्जियां I मोटे अनाजों में- गेहूं, धान, जौ, मक्की आदि सम्मिलित हैं I बारीक अनाजों में- कोदा, शांओक, चिनोई, चोलाए, कावणे आदि शामिल हैं जिन्हें लम्बे समय तक भंडारित किया जा सकता है इसमें कोदा और चोलाए ऐसे पौष्टिक अनाज है जिन्हें कई पीढ़ियों तक रखा जा सकता हैं और इन्हें अकाल का अनाज कहा जाता है I
दलहन एवं तिलहन: दलहनों में- माश, माशोड़े, भोट, कुल्थी, शुन्ठे, लोबिया, राजमाह आदि उगाए जाते हैं I तिलहनो में तिल, तोड़िया, सूरजमुखी, मूंगफली आदि है I नकदी फसलों में अदरक, हल्दी, लाल मिर्च, कालीजीरी, आलू और सब्जियों में लहसुन, प्याज, बाथू, मैथी, कचालू, गागोई आदि उगाये जाते हैं I
कृषि चक्र (रबी एवं खरीफ): वर्ष में दो या तीन फसलें उगाई जाती हैं रवी की फसल और खरीफ की फसल I रवी के फसल अक्तूबर-नवंबर में बीजी जाती है जिसमें गेंहू, जौ, मसूर, तोड़िया, लहसुन और प्याज आदि प्रमुख हैं ये फसल मई और जून में पक कर तैयार होती हैं I इसके बाद खरीफ की फसल जिसमें- मक्की, धान, अदरक, लाल मिर्च, कपास, आलू, कालिजिरी आदि बीजे जाते हैं I खरीफ की फसलों में ही बारीक अनाज जैसे- कोदा, शांवक, चिणोए, कावणे आदि भी बीजा जाता हैं I रवी और खरीफ की फसल के मध्य किसान आलू और चौलाई की फसल उगाने में कामयाब होते हैं जिनका बाज़ार में अच्छा दाम प्राप्त होता हैं I
बीजने की पद्धति: माश, माशोड़े, भोट, तिल, शूंठे, लोबिया, आदि मक्की के साथ ही बीजे जाते हैं I तिल को केवल खेत के किनारों पर जबकि बाकी फसलें मक्की के साथ पूरे खेत में छिड़क कर बीजे जाते हैं I कुल्थी अकेले ही अलग खेत में बीजी जाती हैं I फसलों को बीजने से पहले खेत को अच्छे तरह हल लगाकर गोबर डाला जाता हैं और फिर फसल को छिड़ककर फिर हल लगाया जाता हैं I
इसके अतिरिक्त किसान अपने लिए ताज़ी सब्जियां जैसे बैंगन, भिन्डी, करेला, कद्दू, मीठा करेला, खीरा, ककड़ी, चचरेंडा, लौकी, तुम्बडी, आदि भी उगाता हैं I तिलहनो में तिल और तोडिया मुख्य फसलें हैं I
व्यापार एवं वाणिज्य
i) व्यापार एवं वाणिज्य- झकांडो गाँव के लोग व्यापार और वाणिज्य के व्यवसाय से प्रत्यक्ष रूप से नही जुड़े हैं केवल अपने उत्पाद को बाज़ार तक पनुचाते हैं और उनकी बिक्री कर अपनी जरूरत का सामान खरीदते हैं I इस गाँव ने दैनिक वस्तुओं की बिक्री के लिए दो तीन छोटी-छोटी परचून की दुकाने अवश्य हैं जिन मे से दो झकान्डो, एक भटोडी, दो देवनल, एक भगनाडी स्थित हैं और ये छोटे दुकानदार केवल दैनिक आवश्यकता का ही सामान बेचते हैं किसानो या फिर गाँव के लोगों से सीधी खरीददारी नहीं करते हैं I गाँव के कुछ दुकानदारों ने शिलाई या फिर रोनहाट में दो चार दुकाने शुरू की है I
लोगों को अपने कृषि उत्पाद बेचने के लिए चुड़पुर (विकासनगर), पानीपत, सोनीपत या फिर दिल्ली जाना पड़ता हैं I सौंठ, कालीजीरी और कुल्थी के व्यापारी बहार से आकर सीधे किसानो से खरीदते हैं I चुड़पुर, कालसी, चकारोता, जगाधरी, शैईया यहाँ के लोगों के पुराने व्यापार और वाणिज्य के केंद्र रहे हैं जब लोग अपनी पीठ पर सौंठ, लाल मिर्च, हल्दी, घी, कुल्थी, कलीजीरी आदि घर यहाँ तक पहुंचाते थे और एक दर्जन भर लोग साथ हाट के लिए जाते थे जिसके कारण यहाँ के लोगों को आज भी “हाटी” कहते हैं और इस पूरे हाट में एक सप्ताह तक दिन लग जाते थे I
हात को जाते समय अपने खाने का सारा प्रबंध साथ लेकर चलते थे जिसमे ज्यादातर लोग “सातु’ साथ लेकर जाते थे चूँकि इन्हें पकाने की आवश्यकता नाहे होती है और पाने की साथ घोल कर मसाले, चटनी या फिर गुड़ के साथ खाए जाते हैं I अपने उत्पाद बेचने के बाद निर्धारित बाणियों से वर्ष भर के लिए कपड़ा, नमक, शीरा, गुड़ और कुछ जरूरी मसाले खरीदते थे जिसके लिए कुछ नकद रकम चुकाए जाती थे और शेष राशी बही-खाते डाली जाती थी ताकि अगली बार भी ग्राहक उसी दुकानदार से जुड़ा रहे I
श्रमिक एवं जदूर व्यवस्था
i) जदूर- इस गाँव में श्रमिक सरलता से उपलब्ध है क्योंकि निर्धनता और बेकारी है जिसके लिए एक तो मानसून आधारित कृषि, दूसरा छदम बेरोजगारी और तीसरा व्यवसायी शिक्षा का अभाव उत्तरदायी हैं I किसी भी घर में बाहर से या फिर गाँव के किसी भी श्रमिक को अपने दैनिक कार्यों के लिए नहीं रखे जाते हैं I जरूरत पड़ने पर या फिर किसी बड़े कार्य आने पर गाँव के लोग खुद एक दूसरे की मद्द करते हैं जिसे “बुआरा’ कहते हैं और ये ‘साटा-बाटा” पद्दति पर आधारित हैं अर्थात जब किसी ने आवश्यकता पड़ने पर “बुआर” की है तो समय पड़ने पर उस बुआर को वापिस भी चुकता करना होता है I
दर्जनों की संख्या में इस गाँव से लोग मजदूरी करने के लिए शिमला, जुब्बल, रोहड़ू, कोटखाई, नाहन, पांवटा साहिब, सोलन आदि स्थानों पर जाते हैं और दिहाड़ी कमा कर घर पैसा लाते हैं I जोड़ीदारी प्रथा में दो भाईयों में से एक–एक भाई बारी बारी से मजदूरी करने जाते हैं ताकि एक घर की देखभाल और लोकाचारी निभा सकें I
एक समय में बहुत ही गरीब लोग किसी साधन-सम्पन्न घर में “बैठ” का भी प्रचलन था जिसमें “बैठू” (व्यक्ति) उस घर का हर काम करता था जो इसे सौंपा जाता था और इसके एवज़ में ऋण दी गयी राशि की ब्याज नहीं जुड़ती थी I उस व्यक्ति को केवल खाना प्रदान किया जाता था और तब तक “बैठ” करता था जब तक ऋण की राशि चुकती न की गयी हो I
कई घरों के लोगों ने जिनके पास जमीन जायदाद अधिक है और काम करने वाले लोग कम है उन्होंने उन हरिजन परिवारों को अपनी भूमी खेती के लिए दी है और उसके एवज में ये लोग भूमी देने वालों के घर समय पड़ने पर ‘बुआर’ करते हैं I
संचार व यातायात साधन
i) यातायात के साधन- वर्तमान में झकान्डो गाँव दो सडकों के मध्य स्थित हैं दक्षिण में राष्ट्रीय राज मार्ग ७०७ है और उत्तर में द्राबिल से गताधार तक जाने वाली राज्य सड़क हैं जो की यातायात की दृष्टि से ग्रामीण जीवन की रेखाएं है I इसके अतिरिक्त लगभग सभी उप गाँव प्रधान मंत्री सड़क जोड़ो योजना के तहत लिंक रोड से जुड़ चुके हैं जैसे नीचला भागनाडी, गुन्दडा, देवनल, कौउटा, ठेलेणु, झकान्डो अदि I
लेकिन अभी भी बहुत से उप गाँव जैसे बन्दराह, भाटोडी, भजाऊटी, शोकल आदि सड़क से महरूम है और इस उपगांव के किसानो को अपने उत्पाद पीठ पर लाद कर दो किलोमीटर दूर सड़क तक पहुँचाने पड़ते हैं I बीमारी की स्थिति में मरीज़ को घीले में रजाई डाल कर उठा कर सड़क तक पंहुचाया जाता है और किसी गर्भवती महीला को अचानक दर्द उठाने पर खाट पर सड़क तक पंहुचाया जाता है I गाँव में गिने-चुने चार-छह घर के लोगों के पास ही अपनी व्यक्तिगत गाडिया रखी है और तीन-चार लोग ही ऐसे हैं जिन्होने मालवाहक के लिए अपने छोटे ट्रक रखे हैं I ढूलान के काम के लिए कई घरों ने खच्चर के जोड़े रखे हैं जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर दिहाड़ी में ढूलान के लिए उपलब्ध करवाई जाती हैं I
ii) संचार व्यवस्था- संचार के लिए गाँव में एक डाकघर मौजूद है जो .......से कार्य कर रहा हैं जिसका कार्यालय गुन्दडा में श्री जगत सिंह जी के घर में हैं I गाँव का डाकिया श्री गोपाल सिंह जी बुजुर्गों, विधवाओं, दिव्यान्गो आदि की पेंशन घर घर पहुंचाते हैं I एक समय में ये डाक डाकिया की पीठ पर १० किलोमीटर भट्नौल से नैनीधर जाती थी और बीच में झकांडो की डाक भी यही डाकिया छोड़ता था I डाकघर में टेलीग्राम करने, बचत खाता खुलवाने, आवर्ती जमा करने के अतिरिक्त सभी केंद्रीय डाक योजनाओं की सुविधा उपब्ध है I
वर्तमान में हर घर में मोबाइल फ़ोन मौजूद हैं जिससे संचार की सुविधा का और अधिक विकास हुआ हैं आज सोशल नेट वर्किंग के ज़माने में फेसबुक, व्हाट्सएप, इन्स्टाग्राम, ट्विटर, युट्यूब आदि इस ग्राम के युवा भी चलाते हैं I और गाँव की हर बोलती तस्वीर चाहे वो उत्सव हो, पर्व हो, मेला हो या त्यौहार हो या फिर लोक नाटी का कार्यक्रम हो सब सोशल नेट-वर्किंग साईटों पर साँझा किया जाता है I