लोक अर्थव्यवस्था
आर्थिक संसाधन: ग्रामीण पृष्ठ भूमी पर बसे हाटी जनजाति के आर्थिक संसाधन अत्यंत सीमित और बहुपियोगी हैं I कृषी ग्राम अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और अपनी जरूरतों के 90% संसाधन खेती और पशु पालन से पूरे होते हैं I 80% मकान आज भी लकड़ी और पत्थर से बने हैं जिसके लिए इमारती लकड़ी साथ लगते जंगल से “इमारती लकड़ी वितरण अधिनियम” टी०डी० के तहत प्राप्त होती है और पत्थर प्रचुर मात्रा में हर जगह उपलब्ध हैI खाद्य अनाजों की खरीद की आवश्यकता नहीं रहती हैं क्योंकि पर्याप्त मात्रा में किसान अपने खेतों में उगा लेते हैं I कृषि में नकदी फसलें जैसे-अदरक, लाल मिर्च, कालजीरी, आदि बीजते हैं और वर्ष भर के लिए अपने गुजारे-भत्ते के लिए आमदनी प्राप्त करते हैं I कई घरों के पास मक्की, गेंहू, चौलाई आदि फसले भी अपनी आवश्यकता से अधिक होती हैं जिन्हें बेच कर आय प्राप्त करते हैं I वर्तमान में टमाटर, गौभी, आलू, कचालू, बीन, शिमला मिर्च, मटर आदि हरी सब्जियों से भी किसान अच्छी आय प्राप्त कर रहे हैं और अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं I
ऊँचाई वाले क्षेत्र जैसे में सेब के बगीचे भी तैयार किये जा रहे हैं लेकिन अभी ये बहुत आरम्भिक अवस्था में है और इसमें चुनिदा किसान ही हाथ आजमा रहे हैं I गिरिपार की अर्थव्यस्था का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू हैं-पशु पालन, जो कृषि के पश्चात किसानों की अर्थव्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता हैं I सम्पूर्ण कृषि कार्य पशुओं पर आधारित हैं चाहे खेत में हल लगाने का काम हो या फिर खेतों के लिए गोबर खाद की व्यवस्था हो या फिर भार ढोने के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले पशु हों या फिर मीट और मास प्राप्त करने या फिर दूध, घी, लस्सी आदि प्राप्त करना हो, सब पालतू पशुओं से ही प्राप्त किया जाता हैं I किसान इन पालतू पशुओं से अतिरिक्त उत्पाद तैयार कर जैसे घी आदि बेचकर घर की आधी जरूरतें पूरी करते हैं I कई किसान पशुओं का विक्रय करके अच्छी खासी रकम साल भर इकठ्ठा करने में सफल होते हैं जिसमें विशेष कर बकरियां, भेड़े और माघी के त्यौहार के लिए बकरों को पालकर बेचा जाता हैं I
एक और कटु सत्य यह भी है कि आज की बढती चकाचौंध वाली दुनिया और बाज़ार ने हाटी किसानों को भी ललायित किया हैं और खेती तथा पशु धन से पूरे वर्ष भर का व्यय पूरा होना सम्भव नहीं होता है इसलिए आज भी यहाँ के लोग घर से बहार दिहाड़ी, मजदूरी करने के लिए शिमला, सोलन, चकराता, जुब्बल,नाहन, पांवटा, रोहडू और मंसूरी जाते हैं I आय बढाने के उद्देश्य से लोगों ने बेमैसमी सब्जियां और नकदी फसलों का उत्पादन प्रारम्भ तो किया है लेकिन सिंचाई की उपयुक्त व्यवस्था न होने से इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता हैं I
सरकारी नौकरी पेशे में हाटियों की प्रतिशतता बहुत कम है जो कुछ लोग हैं वो या तो सामान्य सैनिक, लोक निर्माण विभाग में बेलदार, अन्य विभागों में सेवादार, चौकीदार, टी० जी० टी०, जेबीटी, प्राध्यापक व ज्यादा से ज्यादा चुनिन्दा लोग आचार्य पदों तक तक सीमित है I
कृषि: 95% लोगो का प्रमुख व्यवसाय केवल कृषि है और वो भी परम्परागत मानसून आधारित कृषि I गाँव का किसान सीढ़ीनुमा खेत में बैल की जोड़ी और अपने बनाई हुए लकड़ी के हल से परम्परागत खेती करता हैं I यहाँ न तो टिलर और नहीं ट्रेक्टर का प्रचलन है I गेहूं से भूसा अलग करने के लिए गेहूं को खलियान जिसे “खोला” कहते हैं, में मूठ को काटकर पहले सुखाया जाता है और फिर बैल को खलिहान के मध्य निश्चित की गई धूरी जिसे ‘धोरा’ कहते हैं, में ढीली रस्सी बांधकर हर बैल के गर्दन से बांधी जाती हैं और सारे बैल एक साथ वृताकार घुमाएं जाते हैं इसे “दाऊँड” कहते हैं I लगभग तीन या चार घंटे तक कटी गेंहूं की सूखी फसल पर बैलों को घुमाने के बाद गेहूं भूसे से अलग हो जाते है और बाद में उन्हें हवा की सहायता से “शुपे” का प्रयोग करके भूसा अलग किया जाता हैं और गेहूं एक ढेर के रूप में एकत्र होते हैं I लेकिन गेंहू से भूसा अलग करने के लिए अब हर गाँव में एक-एक थ्रेशर जरूर उपलब्ध हैंI
खलिहान में परम्परागत रूप से बैलों द्वारा गेंहू की थ्रेशिंग से पहले धूप में सूखाने का ढंग
गाँव में फसलों की सिंचाई हेतु कुहल का प्रयोग होता है लेकिन ये सिमित जगह ही उपलब्ध है बाकी जगह केवल मानसून आधारित कृषि ही होती है I कुछ खाले के साथ लगते क्षेत्रों में धान की खेती क्यारों में की जाती है जिसे लाणा कहते हैं जहाँ माकूल पानी है और क्यार में धान रोपणे से लेकर पकने तक पानी की उपलब्धता रहती है I धान की फसल पकने के बाद तिरछे रखे बड़े सपाट पत्थर पर पटक कर झाड़ा जाता हैं और फिर “कुटटाली या घटाली” में भरा जाता हैं I
लकड़ी का हल, शमाई, गाण, नासे, फाला, गुन्ने, कोशले, मोईडा, बास, जुतरो, छाबो, दाओं, नियाण, छेणा, आदि कृषि कार्य में उपयोग होने वाले औजार है जिनका प्रबंध हर घर में खुद किसान द्वारा किया जाता है I कृषि कार्य में सभी जातियों और समुदायों के लोग संलग्न हैं I फसल पकने के बाद निम्न तरीके से उन्हें भूसे से अलग किया जाता हैं:-
फसल पकने के बाद निम्न तरीके से उन्हें भूसे से अलग किया जाता हैं:-
| क्र० सं० | पकी फसल का नाम | भूसे से दाना अलग करने की विधि |
|---|---|---|
| १ | मक्की | खोलय (हाथ से दाना अलग करना) |
| २ | गेहूं | गायअ (बैल की सहायता से खलिहान में) |
| ३ | धान | झाडेअ (सपाट पत्थर पर झाड कर) |
| ४ | कोदा | गायअ (बैल की सहायता से खलिहान में) |
| ५ | चौलाए | गायअ (बैल की सहायता से खलिहान में) |
| ७ | कावाणे | मांडेअ (एक सप्ताह ढेरी में रख कर फिर पाँव से मसल कर) |
| ८ | चिणोए | मांडेअ (एक सप्ताह ढेरी में रख कर फिर पाँव से मसल कर) |
| ९ | शांवक | मांडेअ (एक सप्ताह ढेरी में रख कर फिर पाँव से मसल कर) |
| १० | भोट | गायअ, पीटीअ (बैल की सहायता से खलिहान में या फिर डंडे से पीटकर) |
| ११ | माश | गायअ, पीटीअ (बैल की सहायता से खलिहान में या फिर डंडे से पीटकर) |
| १२ | मसूर | पीटीअ (डंडे से पीटकर) |
| १३ | कुल्थी | गायअ, पीटीअ (बैल की सहायता से खलिहान में या फिर डंडे से पीटकर) |
| १४ | लोबिया | खोलय खोलय (हाथ से दाना अलग करना) |
| १५ | बीन | खोलय खोलय (हाथ से दाना अलग करना) |
| १६ | तिल | झाडेअ (घीले की नीचे चादर बिछाकर तील की पकी हुई डंडिया घीले के अन्दर झाड़ी जाती हैं और केवल तील के दाने चादर पर गिरते हैं) |
भूमि स्वामित्व: किसान खुद अपनी भूमी का स्वामी हैं और उसके पास भूमी संबंधी सारे अधिकार सुरक्षित हैं अर्थात वह भूमी को बेच सकता हैं और खरीद सकता हैं लेकिन कृषि भूमी को केवल कृषि उपयोग के लिए राज्य के लोगों को ही बेची जा सकती हैं, बाहरी राज्यों के लोग नहीं खरीद सकते हैं I
भूमी को किस्म के आधार पर विभाजित किया गया है जैसे- अब्बल, दोएम, दोएम अब्बल, ओबड़, बंजर, बंजर कादीम आदि I अब्बल भूमी वो भूमी हैं जिसमें कूहल आदि लगाती हैं और इस प्रकार की भूमी से सरकार आज भी मालगुजारी वसूलती हैं I जोतों का आकार अत्यंत छोटा हैं और केवल बैल की जोडी ही सीढ़ीनुमा खेतों को जोतने के लिए उपयोग की जाती हैं I विरला खेत ही एक बीघा से अधिक होता हैं ज्यादर खेत 5 विश्वा से 7 विश्वा के मध्य हैं I
स्वामित्व वाली कृषी भूमी के अतिरिक्त हर गाँव के पास शामलात भूमी भी उपलब्ध हैं जिसमें पशु चराका, घासिण आदि हैं I शामलात भूमी पर लोगों ने अपने कब्जे स्थापित किए हैं जिसका राजस्व विभाग के द्वारा चक्वंदी के समय वितरण किया हैं और अब केवल पशु चारागाह वाले क्षेत्र ही शामलात में पड़ते हैं I
सम्पूर्ण क्षेत्र का 50% भाग वन भाग के अंतर्गत आता हैं लेकिन वनाच्छादित क्षेत्र केवल 10 से 15% ही हैं जिसमें देवदार जैसे आरक्षित वन हैं I
पशुपालन: हाटी पशुपालन केवल कृषि कार्य और अपने सीमित उपयोग हेतु ही करता हैं I हर घर में घरेलू नस्ल की दो-तीन छोटी गाय पालने का प्रचलन है क्योंकि पहाड़ी और चट्टानी क्षेत्र होने से यहाँ प्रचुर मात्रा में चारे का अभाव रहता है और खुले चारागाह भी उपलब्ध नहीं हैं I खेतो में हल चलाने के उद्देश्य से घरेलु नस्ल के बैल की एक जोड़ी हर किसान परिवार के घर पाली जाती है लेकिन बड़े किसानो के घरों में दो या तीन जोड़ी बैल भी पाले जाते हैं I
गाय के लिए चारे का प्रबंध करना महिलाओं का काम माना जाता हैं और दूध निकालना, दही, लस्सी, मक्खन, घी, बनाने का काम अधिकतर महिलाएं ही करती हैं I गाय के गोबर को “ओबरे” से बहार निकाल कर एक ढेर में एकत्र किया जाता हैं जिसे “गोबराश” कहते हैं, और बाद में ये गोबर केंचुआ खाद में तब्दील होकर खेतों में घीले, शेकुडी, शेकोड़ो और धावनी के माध्यम से ढोया जाता है I
इसके अतिरिक्त बकरियां, भेड़े भी पालते हैं लेकिन ये कार्य केवल चुनिन्दा परिवार ही करते हैं क्योंकि इसके लिए अधिक आदमियों और खुले चरागाह की जरूरत है I ये लोग बरसात के मौसम में अपने मवेशियों को जौंसार-बावर या शिमला जिले के पड़ोसी क्षेत्रों में चराने ले जाते हैं I इसके एवज में शुल्क दिया जाता है जिसे “बुणकरा” कहते हैं I बैल के लिए यह दर 180/रू प्रति बैल प्रति तीन माह वसूली जाती है I
बकरियां और भेड़े पालने से माघ के महीने में त्यौहार के लिए बकरा या खाडू/मेढ़ा भी प्राप्त होता है I कई बड़े संयुक्त परिवारों में भैंस पालने का भी प्रचलन प्रारम्भ हुआ है I चारे के रूप में घास, भूसा, गैहोवान, कुक्डान, ओलाए आदि पशुओं को खिलाया जाता हैं I जिनके पास पर्याप्त बान के जंगल हैं वे बान के पत्ते भी चारे के रूप में खिलाते हैं I
बूढी दियाली की भिऊरी के बाद 15 गते फाल्गुन तक पशु धूप में बांधे जाते है जिसे “थाची” कहते हैं I दुधारू पशुओं के लिए अलग से दाना दिया जाता है जिसे ‘लाम्बड’ और ‘दालो’ कहते हैं I भातियोज़ त्यौहार के लिए पाले जाने वाले बकरे या खाडू के लिए दिया जाने वाला अनाज “कुड़का” और आटे का कच्चा गोला “पीन” कहा जाता है I
ग्राम उद्योग-कताई, बुनाई, लोह-औजार, आभूषण-निर्माण, काष्ठ-उपकरण इत्यादि: कृषि के अतिरिक्त बुनकर, बढ़ई, मिस्त्री, लुहार, दर्जी, नाई, दस्तकार जैसे व्यवसाय का भी प्रचलन रहा है I यदपि इन व्यवसायों से ग्रामीण समाज में केवल जीवन निर्वाह हेतु आय प्राप्ति होती है और वो भी वस्तु विनिमय के रूप में I
गाँव के दस्तकारों द्वारा बांस, तुंअग और निगाल का उपयोग कर सुन्दर घीलें, शेकडी, डाला, शेकडो, छोईलो, शुपो, धावने, उम्टारे, पेटारा, चौंठा, चौंठे, मान्दरो आदि बनाये जाते हैं जिसमे डूम/डोम समुदाय को दक्षता प्राप्त है I इन वस्तुओं के एवज में हर घर से “बुणाई” अनाज के रूप में प्रदान की जाती है I
धातु में तिलियाने, चाल्णों, कुद्वाने, शुपो आदि भी निर्मित किये जाते हैं जिसका निर्माण ठठेरे या कशेरे द्वारा किया जाता है I बढ़ई द्वारा हान्ड़ो, चरखी, नासी, हल, शमाई, गाण, मोईड़ा आदि बनाए जाते हैं I
हाटी अर्थव्यवस्था में कृषि उपयोगी लोक कलात्मक वस्तुएं: शेकड़ो तथा छाबो
बढ़ई लकड़ी के मकान बनाने के काम में दक्ष होते हैं I वाद्य यंत्रों में मढ़ाई का काम खुद ढाकी/बाजगी समुदाय करता हैं जिसके लिए बकरे की खाल का इस्तेमाल किया जाता हैं I ढोल, दुमानो, खंजरी आदि मढ़े जाते है और इनका मेहनताना हर घर से अनाज के रूप में फसल आने के समय दिया जाता हैं I गाँव का ढाकी ही नाई का काम भी करता रहा है और हर संक्रान्ति के दिन घर-घर जा कर बूढ़े बुजुर्गों की हजामत करने का प्रचलन था I इसके बदले में उसे आटे का “सोला” प्रदान किया जाता हैं यदपि अब ये प्रचलन कम हुआ है क्योंकि अब हर घर में लोग खुद शेविंग का सामान रखते हैं I
मिस्त्री पत्थर के काम में दक्ष माने जाते है और हरिजन समुदाय से ज्यादा लोग मिस्त्री का काम करते हैं I दीवार का काम या फिर मकान में पत्थर का काम गाँव के ये लोग ही करते है और इसके बदले अनाज नहीं बल्कि दिहाड़ी-मजदूरी दी जाती हैं I घरों के ढलवां छतों पर स्लेट की छत डालना या फिर उसकी मुरम्मत करना भी मिस्त्री का ही काम होता हैं I
स्थानीय बढ़ई द्वारा उत्तम काष्ठ कला से निर्मित घर के दरवाजे का चौखट
हर घर में ऊन की तक्क्ली और छोईलो रखा होता है और पुरुष और महिलाएं शाम के समय ऊन कातते है I वारिश के मौसम के समय हर घर में शैल की “पागोई” और “दाँव” बनाये जाते हैं I कृषि उपकरण हेतु लोहार से दराती, दात, पचियाड़ो, कातला, चाक़ू, चिमटा, धौन्टू, दाच्टू, फाला, कुराड़े आदि वर्ष भर के लिए बनवाए जाते हैं चूँकि गाँव में लुहार एक साथ ही लौह उपकरण बनाने हेतु गाँव-दर-गाँव घुमते रहते हैं I
इसलिए गाँव के लोग एक जगह सुनिश्चित कर कृषि औजार और घरेलु हथियार बनवाते हैं जिसके एवज़ में अनाज प्रदान किया जाता है जिसे “खलीक” कहते हैं I अर्थात वस्तु का विनिमयकरण ग्रामीण समाज का अभिन्न अंग आज भी विद्यमान हैं I
घर की बाह्य काष्ठ कला का अद्भुत नमूना
परम्परागत फसलें: गिरिपार में फसलों का वर्गीकरण छह प्रकार से किया जा सकता हैं- मोटे अनाज, बारीक अनाज, दलहन, तिलहन, नकदी और साग-सब्जियां I मोटे अनाजों में- गेहूं, धान, जौ, मक्की आदि सम्मिलित हैं I बारीक अनाजों में- कोदा, शांओक, चिनोई, चोलाए, कावणे आदि शामिल हैं जिन्हें लम्बे समय तक भंडारित किया जा सकता है I इसमें कोदा और चोलाए ऐसे पौष्टिक अनाज है जिन्हें अकाल का अनाज कहा जाता है I
दलहनों में- माश, माशोड़े, भोट, कुल्थी, शुन्ठे, लोबिया, राजमाह आदि उगाए जाते हैं I तिलहनो में तिल, तोड़िया, सूरजमुखी, मूंगफली आदि है I नकदी फसलों में अदरक, हल्दी, लाल मिर्च, कालीजीरी, आलू और सब्जियों में लहसुन, प्याज, बाथू, मैथी, कचालू, गागोई आदि उगाये जाते हैं I
घर के बाहरी हिस्से में लटकाई बीज की मक्की
वर्ष में दो या तीन फसलें उगाई जाती हैं- रवी की फसल और खरीफ की फसल I रवी के फसल अक्तूबर-नवंबर में बीजी जाती है जिसमें गेंहू, जौ, मसूर, तोड़िया, लहसुन और प्याज आदि प्रमुख हैं I खरीफ की फसल में मक्की, धान, अदरक, लाल मिर्च, कपास, आलू, कालजिरी आदि बीजे जाते हैं I खरीफ की फसलों में ही बारीक अनाज जैसे- कोदा, शांवक, चिणोए, कावणे आदि भी बीजा जाता हैं I
रवी और खरीफ की फसल के मध्य किसान आलू और चौलाई की फसल उगाने में कामयाब होते हैं जिनका बाज़ार में अच्छा दाम प्राप्त होता हैं I दालों में लोबिया, राजमाह, माश, माशोड़ी, भोअट, कुल्थी, शुंठे, मसूर आदि रवी और खरीफ की फसल के साथ-साथ ही बीजे जाते हैं I
इसके अतिरिक्त किसान अपने लिए ताज़ी सब्जियां जैसे बैंगन, भिन्डी, करेला, कद्दू, मीठा करेला, खीरा, ककड़ी, चचरेंडा, लौकी, तुम्बडी, आदि भी उगाता हैं I फसलों को बीजने से पहले खेत को अच्छी तरह हल लगाकर गोबर डाला जाता हैं और फिर फसल को छिड़ककर फिर हल लगाया जाता हैं I
व्यापार एवं वाणिज्य: अधिकतर हाटी लोग व्यापार और वाणिज्य के व्यवसाय से प्रत्यक्ष रूप से नही जुड़े हैं, वे केवल अपने उत्पाद को बाज़ार तक पंहुचाते हैं और उनकी बिक्री कर अपनी जरूरत का सामान खरीदते हैं I प्राचीन समय में यही व्यवस्था हाट के रूप में विकसित हुई थी जिसमें गाँव भर से लोग दूर के बाजारों में सप्ताह भर तंग पगडंडियों से जाते थे I अब गाँव में दैनिक वस्तुओं की बिक्री के लिए दो तीन छोटी-छोटी परचून की दुकाने अवश्य उपलब्ध हैं I
लोगों को अपने कृषि उत्पाद बेचने के लिए चुड़पुर (विकासनगर), पानीपत, सोनीपत, दिल्ली, सोलन, मंसूरी, यमुनानगर जाना पड़ता हैं I सौंठ, कालीजीरी और कुल्थी के व्यापारी बाहर से आकर सीधे किसानो से खरीदते हैं I
चुड़पुर, कालसी, चकारोता, जगाधरी, शैईया यहाँ के लोगों के पुराने व्यापार और वाणिज्य के केंद्र रहे हैं, जब लोग अपनी पीठ पर सौंठ, लाल मिर्च, हल्दी, घी, कुल्थी, कलीजीरी आदि यहाँ तक पहुंचाते थे I एक दर्जन भर लोग साथ हाट के लिए जाते थे जिसके कारण यहाँ के लोगों को आज भी “हाटी” कहते हैं और इस पूरे हाट में एक सप्ताह तक का समय लग जाता था I
हाट को जाते समय अपने खाने का सारा प्रबंध साथ लेकर चलते थे जिसमे ज्यादातर लोग “सातु” साथ लेकर जाते थे, चूँकि इसे पकाने की आवश्यकता नहीं होती और इसे पानी के साथ घोल कर मसाले, चटनी या गुड़ के साथ खाया जाता है I
अपने उत्पाद बेचने के बाद निर्धारित बाणियों से वर्ष भर के लिए कपड़ा, नमक, शीरा, गुड़ और कुछ जरूरी मसाले खरीदते थे, जिसके लिए कुछ नकद रकम चुकाई जाती थी और शेष राशी बही-खाते में डाली जाती थी ताकि अगली बार भी ग्राहक उसी दुकानदार से जुड़ा रहे I
श्रमिक वर्ग: गाँव में श्रमिक सरलता से उपलब्ध रहता है क्योंकि निर्धनता और बेकारी है जिसके लिए एक तो मानसून आधारित कृषि, दूसरा छदम बेरोजगारी और तीसरा व्यवसायी शिक्षा का अभाव उत्तरदायी हैं I किसी भी घर में बाहर से या फिर गाँव के किसी भी श्रमिक को अपने दैनिक कार्यों के लिए नहीं रखे जाते हैं I
जरूरत पड़ने पर या फिर किसी बड़े कार्य आने पर गाँव के लोग खुद एक दूसरे की मद्द करते हैं जिसे “बुआरा” कहते हैं और ये ‘साटा-बाटा” पद्दति पर आधारित हैं I अर्थात जब किसी ने आवश्यकता पड़ने पर “बुआर” की है तो समय पड़ने पर उस बुआर को वापिस भी चुकता करना होता है I दर्जनों की संख्या में गाँव से लोग मजदूरी करने के लिए शिमला, जुब्बल, रोहड़ू, कोटखाई, नाहन, पांवटा साहिब, सोलन, मंसूरी आदि स्थानों पर जाते हैं I
जोड़ीदारी प्रथा में दो भाइयीं में से एक–एक भाई बारी-बारी से मजदूरी करने जाते हैं ताकि एक घर की देखभाल और लोकाचारी निभा सकें I एक समय में बहुत ही गरीब लोग किसी साधन-सम्पन्न घर में “बैठ” का भी प्रचलन था जिसमें “बैठू” (व्यक्ति) उस घर का हर काम करता था और इसके एवज़ में ऋण दी गयी राशि की ब्याज नहीं जुड़ती थी I
उस व्यक्ति को केवल खाना प्रदान किया जाता था और तब तक “बैठ” करता था जब तक ऋण की राशि चुकती न की गयी हो I कई घरों के लोगों ने जिनके पास जमीन ज्यदात अधिक है उन्होंने कई हरिजन परिवारों को अपनी भूमी खेती के लिए दी है और उसके एवज में ये लोग भूमी देने वालों के घर समय पड़ने पर ‘बुआर’ करते हैं I
माप-तोल के साधन:
माप-तोल की बात करें तो आधुनिकता के प्रभाव से दूर हाटी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आज भी, निम्न इकाई नाप-तोल में प्रयोग की जाती हैं:
| ठोस वस्तु का भार मापना (अनाज) | द्रव्य अवस्था का माप (घी) | लम्बाई का माप | |||
|---|---|---|---|---|---|
| सोल्टा | माप की सबसे छोटी इकाई | सैर | सबसे छोटी इकाई | आंगुल | एक अंगुली की मोटाई |
| सोला | दो सोल्टे के बराबर | बाटुआ | दो सैर | चार आंगुल | चार अँगुलियों के बराबर |
| पाथा | चार सोले के बराबर | पीपा | 4 कि० ग्रा० | कुड़ीअत | अंगूठा और तर्ज़नी के मध्य दुरी |
| आड़ो | चार पाथे | कनस्तर | 16 कि० ग्रा० | बिलात | अंगूठे और छोटी अंगुली के मध्य दुरी |
| छटांग | लगभग 100 ग्राम के बराबर | सोना-चांदी का माप माशा: एक माश के दाने बराबर तोला: १० ग्राम |
शोंअ या हाथ | बड़ी तर्ज़नी से कुहनी तक दुरी | |
| सैर | लगभग 250 ग्राम के बराबर | गांठा | चार हाथ | ||
| पंसेरी | चार सैर के बराबर | ||||
| धौण | चार पंसेरी के बराबर | ||||
| कच्चा मोण | 5 धोण के बराबर (लगभग 32 कि० ग्रा०) | ||||
| पक्का मोण | 40 कि० ग्रा० | ||||
माप-तोल में प्रचलित बाट
अक्सर माप-तोल की इकाइयाँ एक जैसी नहीं हैं क्योंकि सोल्टा, सोला, पाथा, सैर, बाटुआ और हाथ के परिमाप एक से नहीं होते हैं I इस लिए जब भी उधार दिया या लिया जाता था तो एक ही इकाई या वर्तन का उपयोग किया जाता है ताकी हिसाब-किताब बराबर हो सकें I
लकड़ी की लम्बाई “हाथ” या “शौं” और जमीन की लम्बाई और चौडाई “गांठे” में मापी जाती है I बंटवारे के समय एक निश्चित लंबाई की रस्सी से जमीन का बंटवारा किया जाता है जिसे “पागोए” कहते हैं और दो भागों के मध्य एक पत्थर लगाया जाता है जिसे “ओड़ा” कहते है और यही भविष्य में सीमा निर्धारित करता है I
गाँव में ज़मीन या जेवर को गिरवी रख कर विपति के समय पैसा जुटाया जाता हैं जिसे “बांदो” कहते हैं जो दो शर्तों के साथ से रखा जाता है-
पहली शर्त: यदि लेनदार निर्धारित समय तक पैसे वापिस लौटा दें तो उसे “रोएण” कहते है और इसमें देनदार निर्धारित समय तक केवल जमीन पर फसल उगाता हैं I
दूसरी शर्त: के अनुसार यदि लेनदार निर्धारित समय पर ऋण वापिस न चुका पाए तो जेवर हमेशा के लिए देनदार का हो जाता हैं और उसे ‘गालुआं’ कहते हैं जबकी जमीन यदि हमेशा के लिए देनदार के पास चली जाए तो उसे “बे कोरीय’ कहते हैं I
कई मामलों में “जामन” (गारंटर) देकर भी जरूरत के समय पैसा उधार लिया जाता है और यदि लेनदार निर्धारित अवधी पर वापिस न लौटा सकें तो लेनदार “जामन’ से वसूलता हैं I