हाटी जनजाति, गिरिपार सिरमौर, हि० प्र०

सूचना पट्ट / Notice Board
06 Apr 2026
Case Hearing Result

गिरीपार क्षेत्र का ऐतिहासिक एवं जनसांख्यिकीय परिचय

गिरिपार के मूल वाशिन्दें हाटी शिमला संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत सिरमौर जिले की चार विधान सभाओं में अपना प्रभावशाली अस्तित्व चिरकाल से बनाए हुए हैं। जिले की पांच विधान सभा निर्वाचन क्षेत्रों में से केवल शिलाई विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र सम्पूर्ण रूप से हाटी जनजाति क्षेत्र है। हाटी जनजाति की कुल जनसंख्या तीन लाख से अधिक है।

जिला कल्याण अधिकारी के जनसँख्या सर्वेक्षण रिपोर्ट 1998 के अनुसार गिरिपार की कुल जनसँख्या में प्रमुख जातियों का प्रतिशत इस प्रकार है: खोश-कनैत-मियां 42.07%, भाट/ब्राह्मण/पाबुच 16.07%, देवा 2.29% और डेटि 2.03% हैं।

जिला कल्याण विभाग के अनुसार वर्ष 2001 में जातिगत जनसंख्या का विवरण:

1. खश कनैत: 42.07%

2. भाट ब्राह्मण, पाबूच: 16.07%

3. कोली: 26.30%

4. डूम: 3.62%

5. डेटी: 2.03%

6. देवा: 2.29%

7. बाड़ों (धीमान): 1.66%

8. चमार: 2.16%

9. ढाकी: 1.00%

10. लोहार: 1.21%

11. बेड़ा: 0.33%

12. चनाल: 0.85%

13. तूरी: 0.26%

14. सुनार: 0.20%

हाटी समुदाय

गिरिपारो के हाटी, आपणी थाती आपणी माटी

हाटी जनजाति जनजीवन

हाटी समुदाय का जनजीवन अपनी विशिष्ट परंपराओं और सामूहिक एकता के लिए जाना जाता है। यहाँ की जीवनशैली में प्राचीन मान्यताओं और आधुनिक चुनौतियों का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है।

हाटी जनजाति जनजीवन

पारिवारिक व सामाजिक ढांचा: हाटी समुदाय में 'ठगडा' (मुखिया) की प्रधानता वाला संयुक्त परिवार होता है, जहाँ न्याय के लिए पारंपरिक 'खुम्ब्ली' पंचायत और 'बांजा' (बहिष्कार) जैसी व्यवस्थाएँ आज भी प्रभावी हैं।

उत्तराधिकार और विवाह: यहाँ विरासत केवल पुरुषों (जेठोंग और कान्छोंग प्रथा) को मिलती है; विवाह में दहेज के स्थान पर खेती के औजार या पशु देने की अनूठी परंपरा प्रचलित है।

कृषि आधारित अर्थव्यवस्था: समुदाय की ९०% जीविका खेती और पशुपालन पर टिकी है, जहाँ आज भी सीढ़ीनुमा खेतों में पारंपरिक लकड़ी के हल और बैल का उपयोग किया जाता है।

फसलें और तकनीक: नकदी फसलों (अदरक, कालीजीरी) के साथ-साथ अनाज को अलग करने के लिए 'गायअ' और 'मांडेअ' जैसी प्राचीन पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है।

शिल्प और वस्तु-विनिमय: यहाँ डूम और लोहार समुदायों द्वारा बनाए औजारों के बदले अनाज देने की 'खलीक' (वस्तु-विनिमय) प्रथा और सामूहिक श्रम के लिए 'बुआरा' पद्धति आज भी जीवित है।

धार्मिक आस्था और चुनौतियां: स्थानीय देवताओं में अटूट विश्वास के साथ-साथ यह समुदाय सिंचाई की कमी और रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन जैसी आधुनिक चुनौतियों से जूझ रहा है।

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हाटी जनजाति भवन, जिला सिरमौर,
हिमाचल प्रदेश में निर्धारित है।